Bhisham Sahni – Jhoomar | भीष्म साहनी – झूमर | Story

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Hindi Kahani Jhoomar by Bhisham Sahni

खुले मैदान में अर्जुनदास कुर्सी पर बैठा सुस्ता रहा था। मैदान में धूल में उड़ रही थी, पाँवों को मच्छर काट रहे थे, उधर शाम के साए उतरने लगे थे और अर्जुनदास का मन खिन्न–सा होने लगा था। 

जिन बातों ने जिंदगी भर परेशान नहीं किया था, वे जीवन के इस चरण में पहुँचने पर अंदर ही अंदर से गाहे–बगाहे कचोटने–कुरेदने लगती थी। अनबुझी–सी उदासी, मन पर छाने लगती थी। कभी–कभी मन में सवाल उठता, अगर फिर से जिंदगी जीने को मिल जाती तो उसे मैं कैसे जीता? क्या करता, क्या नहीं करता? यह तय कर पाने के लिए भी मन में उत्सुकता नहीं थी। थका–थका सा महसूस करने लगा था। 

Bhisham Sahni Story Jhoomar

यों तो ऐसे सवाल ही निरर्थक होते हैं पर उनके बारे में सोचने के लिए भी मन में उत्साह चाहिए, जो इस समय उसमें नहीं था। जो कुछ जीवन में आज तक करता आया हूँ शायद फिर से वही कुछ करने लगूँगा, पर ज्यादा समझदारी के साथ, दायें–बायें देखकर, सोच–सूझकर, अंधाधुंध भावुकता की रौ में बहकर कुछ नहीं करूँगा। अपना हानि–लाभ भी सोचकर और इतनी जल्दबाजी में भी नहीं जितनी जल्दबाजी में मैं अपनी जिंदगी के फैसले करता रहा हूँ। सोचते–सोचते ही उसने अपने कंधे बिचका दिए। क्या जिंदगी के अहम फैसले कभी सोच–समझकर भी किए जाते हैं?

साए और अधिक गहराने लगे थे। मैदान में बत्तियाँ जल उठीं थी। लंबे–चौड़े मैदान के एक ओर मंच खड़ा किया गया था। मंच पर रोशनियाँ, माइक्रोफोन आदि फिट किए जा रहे थे, मंच ऊँचा था लगभग छह फुट ऊँचा रहा होगा। मंच के नीचे, दायें हाथ को कनात लगाकर कलाकारों के लिए वेशभूषा कक्ष बना दिया गया था। अभी से कनात के पीछे से तबला हारमोनियम बजने की आवाजें आने लगी थी। युवक–युवतियाँ नाटक से पहले पूर्वाभ्यास करने लगे थे। अपनी–अपनी वेशभूषा में सजने लगे थे।

मंच को देखने पर उसके मन में पहले जैसी हिलोर नहीं उठी थी। इसी पुराने ढर्रे पर अभी भी हमारा रंगमंच चल रहा है। दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई है, हम अभी भी वहीं पर खड़े हैं जहाँ पचास साल पहले खड़े थे। फटीचर–सा मंच खड़ा किया करते थे। बिजली की रोशनी नहीं मिलती तो गैस के लैंप उठा लाते। रात पड़ जाती तो वहीं मंच पर अभिनय के बाद सो भी जाते थे। तब भी न जेब में पैसा था न कहीं से चंदा उगाह पाते थे। बस, खेल दिखाओ, दर्शकों के सामने झोली फैलाओ और खर्च निकाल लो। कोई दुवन्नी डाल देता, कोई चवन्नी, कभी कोई दर्शक अधिक भावुक हो उठता तो चमकता रुपए का सिक्का डाल देता। मैं और मेरे साथी, सबकुछ भूले हुए इसी काम में मस्त थे। इसी काम में सारी जवानी खप गई। न जाने कैसे खप गई। उन दिनों भी अर्जुनदास के पाँवों में फटे हुए सस्ते चप्पल हुआ करते थे, आज भी वैसे ही चप्पल है, केवल अब जिंदगी ढलने लगी है। बहुत से साथी काल प्रवाह में बहते हुए न जाने किस ठौर जा लगे हैं। अब वह स्वयं बहुत कम अभिनय कर पाता है, साँस फूलने लगती है, आवाज बैठ जाती है, माथे पर पसीना आ जाता है और टाँगे काँपने–थरथराने लगती है। 

मैदान में युवक–युवतियाँ अब अधिक संख्या में इकठ्ठा होने लगे थे। कुछेक बड़ी उम्र के संयोजकों को छोड़कर बहुत कम लोग इसे जानते–पहचानते थे। कुछ लोग दूर से इसकी ओर इशारा करते। वह रंगमंच का ‘खलीफा’ बन गया था, छोटा–मोटा नेता। इस रंगोत्सव में उसे पुरस्कार देने के लिए बुलाया गया था। आज से नाट्य–समारोह शुरू होने जा रहा था। संयोजक उसकी खातिरदारी कर रहे थे। सब कुछ था, पर मन में वह उछाह नहीं था, जो कभी रहा करता था।

समारोह आरंभ होने में अभी देर थी। अब इस तरह के कार्यक्रम अर्जुनदास से निभते भी नहीं थे। नौ बजे का वक्त देते हैं, दस बजे शुरू करते हैं। दर्शक लोग भोजन करने के बाद, पान चबाते, टहलते हुए आएँगे गप्पे हाँकते। कहीं कोई उतावली नहीं होगी, कोई समय का ध्यान नहीं होगा। यहाँ पर वक्त की पाबंदी कोई अर्थ नहीं रखती। किसी से पूछो, “नाटक कब शुरू होगा?” तो कहेंगे, “यही नौ–दस बजे।” “समाप्त कब होगा?” “यही ग्यारह–बारह बजे।” “अध्यक्ष महोदय कब आएँगे?” “बस आते ही होंगे।” वह जानता था कि नाटक अधकचरा होगा। मंच की साज–सज्जा से ही उसका नौसिखुआपन झलक रहा था। इसके मन में टीस उठने का एक कारण यह भी रहा था। अभिनय और कला कहाँ से कहाँ पहुँच चुकी है पर हमारा यह रंगमंच अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रहा है। आज रंगमंच में प्रविधि के स्तर पर एक विशेष निपुणता आ गई है। रोशनी का प्रयोग मंच की सज्जा, वेश–भूषा, चुस्ती–मुस्तैदी, वह नहीं कि धूल भरे मैदान में – जहाँ पानी का छिड़काव कराने तक के लिए पैसे संयोजकों की जेब में न हों – और फटे–पुराने पर्दे और कनातें और मुड़ी–निचुड़ी दरियाँ, और जहाँ हाथों से, खींच–खींचकर पर्दा गिराया जा रहा हो, और वह भी पूरी तरह स्टेज को ढक नहीं पाए और पर्दे के पीछे, इधर से उधर भागते अभिनेता नज़र आ रहे हों। पर ऐसे ही रंगमंच पर अर्जुनदास ने जिंदगी बिता दी थी।

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