नवरात्रि पर्व (Navaratri Festival): इतिहास, कथा, नौ दिनों का महत्व, गरबा, दुर्गा पूजा और दशहरा
शक्ति की उपासना का सबसे बड़ा पर्व — नवरात्रि (Navratri) का नाम, उत्पत्ति, पौराणिक कथा, नौ देवी रूपों का महत्व, भारत भर में उत्सव और समाज पर प्रभाव की संपूर्ण जानकारी।

नवरात्रि पर्व क्या है? (What is Navratri Festival?)
भारत के सबसे प्राचीन और लोकप्रिय हिंदू पर्वों में से नवरात्रि (Navratri / Navaratri) एक है, जिसमें माँ दुर्गा और उनके नौ रूपों की आराधना की जाती है। यह पर्व अधर्म पर धर्म, अंधकार पर प्रकाश और अहंकार पर शक्ति की विजय का प्रतीक है। साल भर में चार नवरात्रियाँ आती हैं, लेकिन आश्विन मास की शारदीय नवरात्रि (Sharad Navratri) सबसे भव्य और व्यापक रूप से मनाई जाती है और इसका समापन विजयादशमी या दशहरा (Dussehra) पर होता है।
नवरात्रि नाम की उत्पत्ति और अर्थ (Meaning and Origin of the Name)
नवरात्रि शब्द संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है: नव (नौ) और रात्रि (रात)। अर्थात् ‘नौ रातों का समूह’। अध्यात्म में रात्रि को आत्मचिंतन, साधना और शक्ति संचय का समय माना गया है, इसलिए इन नौ रात्रियों में उपासना का विशेष महत्व है। नौ संख्या को भारतीय परंपरा में पूर्णता का सूचक माना जाता है। नौ दिन की साधना से भक्त का तन, मन और आत्मा शुद्ध होता है।
हालाँकि नाम में ‘रात’ है, परंतु पूजा-अर्चना दिन और रात दोनों में चलती है। नौ रात्रियों के बाद दसवाँ दिन विजयादशमी आता है।
नवरात्रि के प्रकार (Types of Navratri)
- चैत्र नवरात्रि (Chaitra Navratri): मार्च-अप्रैल में, हिंदू नववर्ष की शुरुआत और राम नवमी तक।
- शारदीय नवरात्रि (Sharad Navratri): सितंबर-अक्तूबर में, सबसे प्रसिद्ध और व्यापक।
- गुप्त नवरात्रि (Gupt Navratri): माघ और आषाढ़ मास में, मुख्यतः तांत्रिक और साधकों द्वारा साधना।
इन सबमें शारदीय नवरात्रि को महा नवरात्रि कहा जाता है, इसलिए इस लेख में मुख्य चर्चा इसी की है।
नवरात्रि की पौराणिक कथा (Navratri Story)
माँ दुर्गा और महिषासुर की कथा
देवी भागवत और मार्कण्डेय पुराण (दुर्गा सप्तशती) के अनुसार महिषासुर नामक असुर ने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से वरदान पाया कि कोई पुरुष उसे नहीं मार सकेगा। वरदान के अहंकार में उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया और देवताओं को पराजित करके उन्हें स्वर्ग से निकाल दिया।
परेशान देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास गए। तब सभी देवताओं के तेज से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई — माँ दुर्गा। शिव ने त्रिशूल, विष्णु ने चक्र, इंद्र ने वज्र, हिमालय ने सिंह और अन्य देवताओं ने अपने अस्त्र-शस्त्र दिए। सिंह पर सवार देवी ने नौ दिन तक महिषासुर से युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध किया। इसी कारण देवी ‘महिषासुरमर्दिनी’ कहलाईं।
श्रीराम और रावण की कथा
उत्तर भारत में नवरात्रि को श्रीराम की रावण पर विजय से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि लंका युद्ध से पहले श्रीराम ने शक्ति की उपासना की थी। बंगाल की कृत्तिवासी रामायण और लोक परंपराओं में इसे ‘अकाल बोधन’ (असमय में देवी का जागरण) कहा गया है। नौ दिन की उपासना के बाद दशमी को रावण वध हुआ, इसी से दशहरा पर रावण दहन की परंपरा चली। ध्यान रहे कि अलग-अलग क्षेत्रों में कथाएँ और मान्यताएँ अलग हो सकती हैं।
पर्व का संदेश
दोनों कथाओं का सार एक है: अहंकार और अन्याय चाहे कितना भी बलवान हो, अंत में धर्म और सत्य की जीत होती है।
नौ दिन, नौ देवी रूप और उनका महत्व (9 Days of Navratri and Their Significance)
नवरात्रि के प्रत्येक दिन माँ के एक विशेष रूप की पूजा होती है, जिन्हें नवदुर्गा (Navdurga) कहा जाता है।
| दिन | देवी | मुख्य प्रतीक व महत्व |
|---|---|---|
| प्रथम | शैलपुत्री (Shailputri) | पर्वतराज हिमालय की पुत्री; स्थिरता और शुरुआत का प्रतीक |
| द्वितीय | ब्रह्मचारिणी (Brahmacharini) | तप, संयम और वैराग्य |
| तृतीय | चंद्रघंटा (Chandraghanta) | साहस, शांति और निर्भयता |
| चतुर्थ | कूष्माण्डा (Kushmanda) | सृष्टि की आदि शक्ति; स्वास्थ्य और ऊर्जा |
| पंचम | स्कंदमाता (Skandamata) | कार्तिकेय की माता; मातृत्व और वात्सल्य |
| षष्ठ | कात्यायनी (Katyayani) | असुर संहारिणी वीर रूप; विवाह की मान्यताएँ जुड़ी |
| सप्तम | कालरात्रि (Kalaratri) | भय और नकारात्मकता का नाश |
| अष्टम | महागौरी (Mahagauri) | पवित्रता और शांति; कन्या पूजन |
| नवम | सिद्धिदात्री (Siddhidatri) | सिद्धियाँ और साधना की पूर्णता |
प्रथम दिन: माँ शैलपुत्री और घटस्थापना
नवरात्रि का आरंभ घटस्थापना (Ghatasthapana / Kalash Sthapana) से होता है। मिट्टी में जौ (जवारे) बोकर उस पर कलश स्थापित किया जाता है। यह कलश देवी का आसन माना जाता है। शैलपुत्री वृषभ पर सवार हैं और उनके हाथों में त्रिशूल व कमल है।
द्वितीय दिन: माँ ब्रह्मचारिणी
शिव को पाने के लिए की गई कठिन तपस्या का स्मरण। यह दिन अनुशासन, धैर्य और लक्ष्य के प्रति समर्पण सिखाता है।
तृतीय दिन: माँ चंद्रघंटा
माथे पर अर्धचंद्र व घंटा धारण करने वाली देवी सिंह पर विराजमान हैं। इनकी उपासना से भय का नाश और मन में साहस का संचार माना जाता है।
चतुर्थ दिन: माँ कूष्माण्डा
मान्यता है कि अपनी मंद हंसी से ब्रह्माण्ड की रचना इन्हीं ने की। अष्टभुजा स्वरूप में इनकी उपासना स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए की जाती है।
पंचम दिन: माँ स्कंदमाता
भगवान स्कंद (कार्तिकेय) को गोद में लिए यह रूप मातृत्व की प्रतिमूर्ति है। माता-संतान के प्रेम का यह दिन है।
षष्ठ दिन: माँ कात्यायनी
महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रकट हुई वीर रूप देवी। महिषासुर के वध का संबंध इन्हीं से माना जाता है। व्रज में गोपियों ने इन्हीं की पूजा की थी, ऐसी मान्यता भी है।
सप्तम दिन: माँ कालरात्रि
सबसे उग्र लेकिन शुभकारी रूप, इसलिए इन्हें ‘शुभंकरी’ भी कहा जाता है। इनकी पूजा से भय, अंधकार और बाधाओं के नाश की मान्यता है। बंगाल में इसी दिन के आस-पास महासप्तमी पूजा होती है।
अष्टम दिन: माँ महागौरी (दुर्गाष्टमी)
श्वेत वर्ण की शांत देवी। इस दिन कन्या पूजन (Kanya Pujan) और हवन की परंपरा है। बंगाल में इसी दिन संधि पूजा का विशेष महत्व है।
नवम दिन: माँ सिद्धिदात्री
सभी सिद्धियाँ प्रदान करने वाली देवी। इस दिन कन्या भोज, हवन और व्रत का समापन होता है। उत्तर भारत में इसी दिन रामनवमी (चैत्र नवरात्रि में) भी मनाई जाती है।
व्रत, पूजा और खान-पान (Navratri Fasting and Rituals)
- घटस्थापना और ज्योत: नौ दिन तक अखंड ज्योत जलाने की परंपरा में कई घरों में मान्यता है।
- उपवास (Navratri Vrat): कुट्टू का आटा, सिंघाड़ा, साबूताना, समाक चावल, फल, दूध और सेंधा नमक का प्रयोग। अनाज, प्याज-लहसुन और मांसाहार से परहेज।
- दुर्गा सप्तशती और देवी स्तुति पाठ: सुबह-शाम आरती और मंत्र जप।
- कन्या पूजन: अष्टमी या नवमी पर कुंवारी कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर भोजन कराना और उपहार देना।
- व्रत के नियम: उपवास अपनी सेहत के अनुसार करें। मधुमेह, गर्भावस्था या अन्य स्वास्थ्य समस्या में डॉक्टर से परामर्श लें।
भारत में नवरात्रि कैसे मनाई जाती है? (How Navratri is Celebrated in India)
नवरात्रि भारत के हर क्षेत्र में अपने अलग रंग में मनाई जाती है।
उत्तर भारत: रामलीला और वैष्णो देवी की भक्ति
उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश जैसे क्षेत्रों में नौ दिन व्रत, देवी जागरण और रामलीला (Ramlila) का मंचन होता है। दशवें दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं। जम्मू में माँ वैष्णो देवी धाम पर इन दिनों भारी भीड़ होती है।
हिमाचल प्रदेश: कुल्लू दशहरा
कुल्लू में दशहरा विजयादशमी से शुरू होकर लगभग एक सप्ताह चलता है, जिसमें घाली के देवी-देवताओं की पालकियाँ रघुनाथ जी के साथ शोभायात्रा में शामिल होती हैं।
मैसूर दशहरा (Mysuru Dasara), कर्नाटक
नाडहब्ब (राज्य उत्सव) के रूप में मनाए जाने वाले इस उत्सव में मैसूर पैलेस की रोशनी, सांस्कृतिक कार्यक्रम और विजयादशमी पर भव्य जुलूस आकर्षण है। यह सदियों पुरानी विजयनगर साम्राज्य की परंपरा से जुड़ा माना जाता है।
दक्षिण भारत: गोलु / बॊम्मई कॊलु
तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में घरों में सीढ़ीनुमा मंच पर गुड़ियाँ और मूर्तियाँ सजाई जाती हैं और महिलाएँ एक-दूसरे को आमंत्रित करती हैं। केरल में नवमी पर आयुध पूजा और विजयादशमी पर बच्चों का विद्यारंभ संस्कार लोकप्रिय है।
महाराष्ट्र और अन्य क्षेत्र
महाराष्ट्र में घटस्थापना, देवी आराधना और विजयादशमी पर ‘सोने’ के रूप में आपटा के पत्ते बाँटने की परंपरा है। अन्य राज्यों में भी स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार इसे मनाया जाता है।
पश्चिम बंगाल: दुर्गा पूजा का महाउत्सव (Durga Puja in West Bengal)
पश्चिम बंगाल में नवरात्रि का स्वरूप दुर्गा पूजा (Durga Puja) के रूप में सामने आता है और यहाँ यह सबसे बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक उत्सव माना जाता है। बंगाली मान्यता में दुर्गा अपने माये (मायके) आती हैं और साथ में लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिकेय को लेकर आती हैं। कोलकाता की दुर्गा पूजा को यूनेस्को (UNESCO) ने 2021 में मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया था।
बंगाल के प्रमुख दिन और रीतियाँ
- महालया (Mahalaya): पितृपक्ष के अंत में देवी के आगमन का संकेत; सुबह ‘महिषासुरमर्दिनी’ का पाठ और चक्षुदान की परंपरा।
- षष्ठी: बोधन और माँ का आवाहन; पंडालों में मूर्तियाँ प्रतिष्ठित।
- सप्तमी: नवपत्रिका (कलाबहू) स्नान और पूजा।
- अष्टमी: पुष्पांजलि और संधि पूजा (अष्टमी व नवमी के संधिकाल में)।
- नवमी: महाआरती और भोग।
- दशमी (बिजया): सिंदूर खेला (Sindoor Khela), सुहागिन महिलाओं का एक-दूसरे को सिंदूर लगाना और मूर्ति विसर्जन।
पंडाल, ढाक और कला
हर वर्ष भव्य पंडाल (Pandal) अलग-अलग थीम पर बनाए जाते हैं। ढाक की धुन, धुनची नृत्य, संध्या आरती और भोजन के स्टॉल पूरे शहर को उत्सव में बदल देते हैं। कुमोरटुली के कारीगर मिट्टी से मूर्तियाँ तैयार करते हैं और परंपरा के अनुसार कुछ मिट्टी वेश्यालय की दहलीज से लाई जाती है, जो समाज में समावेश का संदेश देती है।
गुजरात: गरबा और डांडिया की धूम (Navratri in Gujarat)
गुजरात में नवरात्रि नौ रातों का एक बड़ा सामूहिक उत्सव है। शाम को माँ की आरती के बाद लाखों लोग रात भर नृत्य करते हैं। अहमदाबाद, वडोदरा, सूरत और राजकोट के बड़े आयोजन प्रसिद्ध हैं।
गरबा (Garba) का अर्थ और मान्यता
यह ‘गरबा’ शब्द ‘गर्भ’ और ‘दीप’ से जुड़ा माना जाता है। पारंपरिक रूप से मिट्टी के छिद्रदार घड़े में दीप जलाकर उसे माँ की प्रतिमा या शक्ति के प्रतीक के मध्य रखा जाता है और उसके चारों ओर गोल घूमकर नृत्य होता है। गोल घेरा जीवन के चक्र का भी प्रतीक है: जन्म, जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गरबा को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में 2023 में शामिल किया गया।
गरबा बनाम डांडिया रास
गरबा में ताली की लय पर हाथों के संचालन के साथ नृत्य होता है, जबकि डांडिया रास (Dandiya Raas) में रंगीन डंडियों का प्रयोग होता है। मान्यता है कि डंडिया माँ दुर्गा और महिषासुर के युद्ध की तलवारों का प्रतीक है। कई लोग इसे कृष्ण-राधा की रासलीला से भी जोड़ते हैं। लोकप्रिय गरबा गीत, ढोल और रंग-बिरंगी चणिया-चोली व केडिया इस उत्सव की पहचान हैं।
गुजराती समाज और अर्थव्यवस्था
गरबा सीखने की कक्षाएँ, परिधान का बाजार, संगीत कार्यक्रम और खानपान की दुकानें इस पर्व से स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल देती हैं। प्रवासी गुजराती समुदाय अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य देशों में भी गरबा का आयोजन करता है।
नवरात्रि का समापन: विजयादशमी / दशहरा (Dussehra)
नौ दिन की उपासना के बाद दसवाँ दिन विजयादशमी (Vijayadashami / Dussehra) है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। उत्तर भारत में इस दिन रावण दहन होता है, बंगाल में दुर्गा विसर्जन और सिंदूर खेला होता है, दक्षिण में शस्त्र और पुस्तक पूजा होती है और मैसूर व कुल्लू में भव्य शोभायात्राएँ निकलती हैं। इस दिन नए कार्य की शुरुआत शुभ मानी जाती है।
समाज पर नवरात्रि का प्रभाव (Impact of Navratri on Society)
सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत
गरबा, रामलीला और पंडाल लोगों को एक साथ लाते हैं। जाति, वर्ग और उम्र के भेद कुछ समय के लिए कम होते हैं। लोक गीत, नृत्य और कलाओं का संरक्षण भी होता है।
नारी शक्ति का सम्मान
नवरात्रि नारी को शक्ति का स्रोत मानने का संदेश देती है। कन्या पूजन की परंपरा इसी भाव का हिस्सा है। साथ ही समाज से अपेक्षा है कि वह वास्तविक जीवन में भी महिलाओं के साथ सम्मान और सुरक्षा का व्यवहार करे।
अर्थव्यवस्था और रोजगार
मूर्तिकार, कारीगर, फूल विक्रेता, सजावट और वस्त्र व्यापारी, संगीतकार, खाद्य विक्रेता और परिवहन सेवाओं के लिए यह रोज़गार का बड़ा मौसम होता है। पर्यटन को भी इससे बल मिलता है, खासकर कोलकाता और गुजरात में।
स्वास्थ्य और अनुशासन
व्रत और सात्विक भोजन से आत्मअनुशासन और संयम की आदत विकसित होती है। सामूहिक नृत्य शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक माना जाता है।
पर्यावरण की चुनौतियाँ
प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियाँ, रासायनिक रंग और तेज ध्वनि नदियों-तालाबों और वातावरण को नुकसान पहुँचाती हैं। इसलिए मिट्टी की इको-फ्रेंडली मूर्तियाँ, प्राकृतिक रंग और कम शोर वाले आयोजन अपनाने की पहल बढ़ रही है।
नवरात्रि में क्या करें और क्या न करें? (Navratri Do’s and Don’ts)
- सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा करें।
- घर की स्वच्छता और सात्विकता बनाए रखें।
- क्रोध, निंदा और दिखावे से बचें।
- गरबा/पंडाल में भीड़ के समय सुरक्षा और शिष्टाचार का ध्यान रखें।
- जरूरतमंदों की मदद करें; यही देवी उपासना का सार है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
नवरात्रि नौ रातों और दस दिनों (विजयादशमी सहित) का पर्व है। तिथियों के घटने-बढ़ने से कभी-कभी दिन कम या अधिक भी हो सकते हैं।
मूल भाव समान है — देवी उपासना — लेकिन बंगाल में मुख्य उत्सव षष्ठी से दशमी तक चलता है और इसमें मूर्ति पूजा व पंडाल की प्रमुखता होती है।
यह देवी की शक्ति की आराधना और सामूहिक उल्लास का माध्यम है, जिसमें नृत्य को भक्ति का रूप माना जाता है।
नहीं, यह श्रद्धा और सामर्थ्य पर निर्भर है। कई लोग आंशिक उपवास, जप या सेवा के माध्यम से भी नवरात्रि मनाते हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
नवरात्रि पर्व (Navratri Festival) केवल पूजा-उपवास का अवसर नहीं, बल्कि शक्ति, संयम, समानता और एकता का उत्सव है। कोलकाता के पंडालों से लेकर अहमदाबाद के गरबा मैदानों तक, और उत्तर की रामलीला से लेकर दक्षिण के गोलु तक, यह पर्व भारत की विविधता में एकता का सुंदर उदाहरण है। यह संदेश देता है कि अहंकार और अन्याय अस्थायी हैं और साहस, सत्य और करुणा की शक्ति ही अंततः जीतती है।
डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित सामान्य जानकारी है। तिथियाँ और रीति-रिवाज क्षेत्र के अनुसार भिन्न हो सकते हैं।