श्रद्धांजलि: भारतीय सिनेमा के ‘भारत कुमार’ महानायक मनोज कुमार अब हमारे बीच नहीं रहे | Bharat Kumar of Indian Cinema

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Manoj Kumar, known as Bharat Kumar of Indian cinema, passed away on 04 April 2025. Through immortal films like ‘Shaheed’, ‘Upkar’ and ‘Roti Kapda Aur Makaan’, he ignited patriotism in millions. His legacy will live forever. A tribute to the legend!

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आज हिंदी सिनेमा का एक युग समाप्त हो गया है। मनोज कुमार, जिन्होंने अपने अभिनय और निर्देशन से करोड़ों देशवासियों के दिलों में देशभक्ति की अलख जगाई, आज 04 अप्रैल 2025 को हम सभी को अलविदा कह गए। उनका निधन न सिर्फ़ बॉलीवुड, बल्कि पूरे भारत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। वह सिर्फ़ एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक विचार, एक प्रेरणा और देशप्रेम के प्रतीक थे। आज हम उनके अद्भुत जीवन, उनकी फ़िल्मों और उनकी अमर विरासत को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

प्रारंभिक जीवन और संघर्ष

मनोज कुमार का जन्म 24 जुलाई, 1937 को अविभाजित भारत के अबोटाबाद (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। उनका वास्तविक नाम हरिकिशन गिरि गोस्वामी था। विभाजन के बाद उनका परिवार दिल्ली आ गया, जहाँ उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की। बचपन से ही उन्हें फ़िल्में देखने का शौक था और वह दिलीप कुमार के अभिनय से बहुत प्रभावित थे।

एक बार जब वह दिलीप कुमार की फ़िल्म ‘शबनम’ देख रहे थे, तो उन्होंने सोचा कि काश वह भी एक दिन बड़े स्टार बनें। यही सपना लेकर वह मुंबई आ गए और अपने नाम को बदलकर ‘मनोज कुमार’ रख लिया। शुरुआती दिनों में उन्हें काफ़ी संघर्ष करना पड़ा। छोटी-मोटी भूमिकाएँ मिलीं, लेकिन वह टिक नहीं पाईं।

फ़िल्मी करियर की शुरुआत और देशभक्ति की प्रतिमूर्ति

मनोज कुमार को पहली बड़ी सफलता 1960 में आई फ़िल्म ‘कांच की गुड़िया’ से मिली। लेकिन असली पहचान उन्हें 1965 में आई फ़िल्म ‘शहीद’ से मिली, जिसमें उन्होंने भगत सिंह का किरदार निभाया। इसके बाद उन्होंने ‘उपकार’ (1967)‘पूरब और पश्चिम’ (1970)‘रोटी कपड़ा और मकान’ (1974) और ‘क्रांति’ (1981) जैसी सुपरहिट फ़िल्में दीं, जिन्होंने उन्हें ‘भारत कुमार’ का खिताब दिलाया।

उनकी फ़िल्में सिर्फ़ मनोरंजन नहीं करती थीं, बल्कि देशभक्ति, सामाजिक सरोकार और मानवीय मूल्यों का संदेश देती थीं। “ये देश है वीर जवानों का…” और “मैं न भूलूँगा, मैं न भूलूँगा…” जैसे गाने आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं।

निर्देशन, पुरस्कार और सम्मान

मनोज कुमार ने निर्देशन के क्षेत्र में भी बड़ी सफलता हासिल की। ‘उपकार’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फ़िल्मफेयर अवार्ड मिला। 1972 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया और 2015 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार देकर उनके योगदान को सलाम किया।

व्यक्तिगत जीवन और विरासत

मनोज कुमार ने 1964 में शशि गोस्वामी से शादी की और उनके दो बेटे विशाल और कुनाल हैं। वह हमेशा सादगी और समर्पण की मिसाल रहे। आज उनके जाने से सिनेमा जगत में एक शून्य पैदा हो गया है, लेकिन उनकी फ़िल्में और विचार हमेशा हमारे साथ रहेंगे।

अंतिम श्रद्धांजलि

मनोज कुमार सिर्फ़ एक कलाकार नहीं थे, बल्कि वह भारतीय सिनेमा के वह स्तंभ थे, जिन्होंने देशप्रेम को फ़िल्मों का मुख्य विषय बनाया। आज वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी अमर फ़िल्में और यादें हमेशा हमें प्रेरित करती रहेंगी।

“धन्यवाद, मनोज साहब, आपने हमें देशभक्ति का असली मतलब सिखाया। आपकी विरासत हमेशा जीवित रहेगी।” ॐ शांति।

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