Kabir Ke Dohe | कबीर के दोहे

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Hindi Kala presents you Kabir Ke Dohe. Also, known as Kabir Das who was a 15th-century Indian mystic poet and saint.

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Kabir Ke Dohe

आछे दिन पाछे गए, हरि से किया न हेत ।
अब पछताए होत क्या, चिड़िया चुग गयी खेत ॥


अर्थ: सुख के समय में भगवान् का स्मरण नहीं किया, तो अब पछताने का क्या फ़ायदा। जब खेत पर ध्यान देना चाहिए था, तब तो दिया नहीं, अब अगर चिड़िया सारे बीज खा चुकी हैं, तो खेद से क्या होगा।

आज कहै मैं काल भजू, काल कहै फिर काल
आज काल के करत ही, औसर जासी चाल।


अर्थ : लोग आज कहते हैं कि मैं कल से प्रभु का भजन करुॅंगा और कल कहतें हैं कि कल से करुॅंगा। इसी आज कल के फेरे में प्रभु के भजन का अवसर चला जाता है और जीवन व्यर्थ बीत जाता है।

आगि आंचि सहना सुगम, सुगम खडग की धार
नेह निबाहन ऐक रास, महा कठिन ब्यबहार।


अर्थ : अग्नि का ताप और तलवार की धार सहना आसान है किंतु प्रेम का निरंतर समान रुप से निर्वाह अत्यंत कठिन कार्य है।

आंखि ना देखे बापरा, शब्द सुनै नहि कान
सिर के केश उजल भये, आबहु निपत अजान।

अर्थ : मूर्ख अपने आॅंख से नहीं देख पाते हैं न हीं वे कानों से सुन पाते हैं। सिर के सभी बाल सफेद हो गये पर वे अभी पूरी मूर्खता में हैं। उम्र से ज्ञान नहीं होता और वे ईश्वर की सत्ता पर विश्वास नहीं कर पाते हैं।

आंखो देखा घी भला, ना मुख मेला तेल
साधु सोन झगरा भला, ना साकुत सोन मेल।


अर्थ : धी देखने मात्र से ही अच्छा लगता है पर तेल मुॅुह में डालने पर भी अच्छा नहीं लगता है। संतो से झगड़ा भी अच्छा है पर दुष्टों से मेल-मिलाप मित्रता भी अच्छा नहीं है।

आपा तजे हरि भजे, नख सिख तजे विकार ।
सब जीवन से निर्भैर रहे, साधू मता है सार ॥

अर्थ: जो व्यक्ति अपने अहम् को छोड़कर, भगवान् कि उपासना करता है, अपने दोषों को त्याग देता है, और किसी जीव-जंतु से बैर नहीं रखता, वह व्यक्ति साधू के सामान और बुद्धिमान होता है।

आरत कैय हरि भक्ति करु, सब कारज सिध होये
करम जाल भव जाल मे, भक्त फंसे नहि कोये।


अर्थ : प्रभु की भक्ति आर्त स्वर में करने से आप के सभी कार्य सफल होंगे। सांसारिक कर्मों के सभी जाल भक्तों को कमी फाॅंस नहीं सकते हैं। प्रभु भक्तों की सब प्रकार से रक्षा करते है।

आस करै बैकुंठ की, दुरमति तीनो काल
सुक्र कही बलि ना करै, तातो गयो पताल।


अर्थ : स्वर्ग की आशा में उसकी दुष्ट बुद्धि से उसके तीनों समय नष्ट हो गये। उसे गुरु शुक्राचार्य के आदेशों की अवहेलना के कारण नरक लोक जाना पड़ा।

आठ पहर यूॅ ही गया, माया मोह जंजाल
राम नाम हृदय नहीं, जीत लिया जम काल।


अर्थ : माया मोह अज्ञान भ्रम आसक्ति में संपूर्ण जीवन बीत गया। हृदय में प्र्रभु का नाम भक्ति नहीं रहने के कारण मृत्यु के देवता यम ने मनुष्य को जीत लिया है।

आतम अनुभव जब भयो, तब नहि हर्श विशाद
चितरा दीप सम ह्बै रहै, तजि करि बाद-विवाद।


अर्थ : जब हृदय में परमात्मा की अनुभुति होती है तो सारे सुख दुख का भेद मिट जाता है। वह किसी चित्र के दीपक की लौ की तरह स्थिर हो जाती है और उसके सारे मतांतर समाप्त हो जाते है।

आतम अनुभव ज्ञान की, जो कोई पुछै बात
सो गूंगा गुड़ खाये के, कहे कौन मुुख स्वाद।


अर्थ : परमात्मा के ज्ञान का आत्मा में अनुभव के बारे में यदि कोई पूछता है तो इसे बतलाना कठिन है। एक गूंगा आदमी गुड़ खांडसारी खाने के बाद उसके स्वाद को कैसे बता सकता है।

आवत गारी एक है, उलटन होय अनेक ।
कह कबीर नहिं उलटिये, वही एक की एक ॥


अर्थ: अगर गाली के जवाब में गाली दी जाए, तो गालियों की संख्या एक से बढ़कर अनेक हो जाती है। कबीर कहते हैं कि यदि गाली को पलटा न जाय, गाली का जवाब गाली से न दिया जाय, तो वह गाली एक ही रहेगी ।

आये है तो जायेगा, राजा रंक फकीर
ऐक सिंहासन चढ़ि चले, ऐक बांधे जंजीर।


अर्थ :इस संसार में जो आये हैं वे सभी जायेंगे राजा, गरीब या भिखारी। पर एक सिंहासन पर बैठ कर जायेगा और दूसरा जंजीर में बंध कर जायेगा। धर्मात्मा सिंहासन पर बैठ कर स्वर्ग और पापी जंजीर में बाॅंध कर नरक ले जाया जायेगा।

अब तो जूझै ही बनै, मुरि चलै घर दूर
सिर सहिब को सौपते, सोंच ना किजैये सूर।


अर्थ : अब तो प्रभु प्राप्ति के युद्ध में जूझना ही उचित होगा-मुड़ कर जाने से घर बहुत दूर है। तुम अपने सिर-सर्वस्व का त्याग प्रभु को समर्पित करो। एक वीर का यही कत्र्तव्य है।

अच्छे दिन पाछे गये, हरि सो किया ना हेत
अब पछितावा क्या करै, चिड़िया चुगि गयी खेत।


अर्थ : हमारे अच्छे दिन बीत गये पर हमने ईश्वर से प्रेम नहीं किया। अब पश्चाताप करने से कया लाभ होगा जब पक्षी खेत से सभी दाने चुन कर खा चुके हंै।

ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस,
भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस


अर्थ: कबीर संसारी जनों के लिए दुखित होते हुए कहते हैं कि इन्हें कोई ऐसा पथप्रदर्शक न मिला जो उपदेश देता और संसार सागर में डूबते हुए इन प्राणियों को अपने हाथों से केश पकड़ कर निकाल लेता |

सी ठाठन ठाठिये, बहुरि ना येह तन होये
ज्ञान गुदरी ओढ़िये, काढ़ि ना सखि कोये।


अर्थ : एैसा वेश रहन सहन रखें की पुनःयह शरीर ना हो। पुनर्जन्म न हो। तुम ज्ञान की गुदरी ओढ़ो जो तुम से कोई ले न सके छीन न सके।

सी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय ।
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय ॥


अर्थ: अगर अपने भाषा से अहं को हटा दिया जाए, तो दूसरों के साथ खुद को भी शान्ति मिलती है।

अजार धन अतीत का, गिरही करै आहार
निशचय होयी दरीदरी, कहै कबीर विचार।


अर्थ : सन्यासी को दान में प्राप्त धन यदि कोई गृहस्थ खाता है तो वह निश्चय ही दरिद्र हो जायेगा। ऐसा कबीर का सुबिचारित मत है।

अंधे मिलि हाथी छुवा, अपने अपने ज्ञान
अपनी अपनी सब कहै, किस को दीजय कान।


अर्थ : अनेक अंधों ने हाथी को छू कर देखा और अपने अपने अनुभव का बखान किया। सब अपनी अपनी बातें कहने लगें-अब किसकी बात का विश्वास किया जाये।

अंधो का हाथी सही, हाथ टटोल-टटोल
आंखो से नहीं देखिया, ताते विन-विन बोल।


अर्थ : वस्तुतः यह अंधों का हाथी है जो अंधेरे में अपने हाथों से टटोल कर उसे देख रहा है । वह अपने आखों से उसे नहीं देख रहा है और उसके बारे में अलग अलग बातें कह रहा है । अज्ञानी लोग ईश्वर का सम्पुर्ण वर्णन करने में सझम नहीं है ।

अनराते सुख सोबना, राते निन्द ना आये
ज्यों जाल छुटि माछरि, तलफत रैन बिहाये।


अर्थ : प्रभु प्रेम से बिमुख नीन्द में सोते है परन्तु उन्हें रात में निश्चिन्तता की नीन्द नहीं आती है। जल से बाहर मछली जिस तरह तड़पती रहती है उसी तरह उनकी रात भी तड़पती हुई बीतती है।

अर्घ कपाले झूलता, सो दिन करले याद
जठरा सेती राखिया, नाहि पुरुष कर बाद।

अर्थ : तुम उस दिन को याद करो जब तुम सिर नीचे कर के झूल रहे थे। जिसने तुम्हें माॅं के गर्भ में पाला उस पुरुष-भगवान को मत भूलो। परमात्मा को सदा याद करते रहो।

अहिरन की चोरी करै, करै सुई की दान
उॅचे चढ़ि कर देखता, केतिक दूर बिमान।


अर्थ : लोग लोहे की चोरी करते हैं और सूई का दान करते हैं। तब उॅंचे चढ़कर देखते हैं कि विमान कितनी दूर है। लोग जीवन पर्यन्त पाप करते हैं और अल्प दान करके देखते हैं-सोंचते हैं कि उन्हें स्वर्ग ले जाने के लिये विमान कितनी दूर पर है और कब ले जायेगा।

बाहर क्या दिखलाये , अंतर जपिए राम |
कहा काज संसार से , तुझे धानी से काम ||


अर्थ: बाहरी दिखावे कि जगह, मन ही मन में राम का नाम जपना चाहिए। संसार कि चिंता छोड़कर, संसार चलाने वाले पर ध्यान देना चाहिए।

बाना देखि बंदिये, नहि करनी सो काम
नीलकंठ किड़ा चुगै, दर्शन ही सो काम।


अर्थ : संत की वेश भूषा देख कर उन्हें प्रणाम करैं। उनके कर्मों से हमारा कोई मतलव नहीं है। नीलकंठ पक्षी कीडा चुगता है। पर उसका दर्शण ही शुभ पून्य कारक होता है।

बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर ।
पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर ॥


अर्थ: खजूर का पेड़ न तो राही को छाया देता है, और न ही उसका फल आसानी से पाया जा सकता है। इसी तरह, उस शक्ति का कोई महत्व नहीं है, जो दूसरों के काम नहीं आ सकती।

बैरागी बिरकत भला, गिरा परा फल खाये
सरिता को पानी पिये, गिरही द्वार ना जाये।


अर्थ : संसार की इच्छाओं से बिरक्त संत अच्छे है जो जंगल के गिरे हुऐ फल खा कर एंव नदी का जल पीकर निर्वाह करते है। परंतु किसी गृहस्थ के द्वार पर कुछ मांगने नहीं जाते है।

बेटा जाय क्या हुआ, कहा बजाबै थाल
आवन जावन हवै रहा, ज्यों किरी का नाल।

अर्थ : पुत्र के जन्म से क्या हुआ? थाली पीट कर खुशी क्यों मना रहे हो? इस जगत में आना जाना लगा ही रहता है जैसे की एक नाली का कीड़ा पंक्ति बद्ध हो कर आजा जाता रहता है।

भगती बिगाड़ी कामिया , इन्द्री करे सवादी |
हीरा खोया हाथ थाई , जनम गवाया बाड़ी ||


अर्थ: इच्छाओं और आकाँक्षाओं में डूबे लोगों ने भक्ति को बिगाड़ कर केवल इन्द्रियों की संतुष्टि को लक्ष्य मान लिया है। इन लोगों ने इस मनुष्य जीवन का दुरूपयोग किया है, जैसे कोई हीरा खो दे।

भक्ति दुहिली राम की, जस खाड़े की धार
जो डोलै सो कटि परै, निश्चल उतरै पार।


अर्थ : राम की भक्ति दुधारी तलवार की तरह है। जो संसारिक वासना से चंचल मन वाला है, वह कट कर मर जायेगा पर स्थिर बुद्धि वाला इस भव सागर को पार कर जायेगा।

भक्ति दुवारा सांकरा, राई दसवै भाये
मन तो मैगल होये रहै, कैसे आबै जाये।


अर्थ : भक्ति का द्वार अति संर्कीण है। यह राई के दसवें भाग के समान छोटा है। परंतु मन मदमस्त हाथी की तरह है-यह कैसे उस द्वार से आना-जाना कर पायेगा।

भक्ति गेंद चैगान की, भाबै कोई लेजाये
कहै कबीर कछु भेद नहि, कहा रंक कह राये।


अर्थ : भक्ति चैराहे पर रखी गेंद के समान है जिसे वह अच्छा लगे उसे ले जा सकता है। कबीर कहते हैं कि इसमे अमीर-गरीब,उॅंच-नीच,स्त्री पुरुष,मुर्ख-ज्ञानी का कोई भेद नहीं है।

भक्ति कठिन अति दुर्लभ है, भेस सुगम नित सोये
भक्ति जु न्यारी भेस से येह जाने सब कोये।


अर्थ : प्रभु भक्ति अत्यंत कठिन और दुर्लभ वस्तु है किंतु इसका भेष बना लेना अत्यंत सरल कार्य है। भक्ति भेष बनाने से बहुत उत्तम है-इसे सब लोग अच्छी तरह जानते हैं।

भरा होये तो रीतै, रीता होये भराय
रीता भरा ना पाइये, अनुभव सोयी कहाय।


अर्थ : एक धनी निर्धन और निर्धन धनी हो सकता है। परंतु परमात्मा का निवास होने पर वह कभी पूर्ण भरा या खाली नहीं रहता। अनुभव यही कहता है। परमात्मा से पुर्ण हृदय कभी खाली नहीं-हमेशा पुर्ण ही रहता है।

भरम ना भागै जीव का, बहुतक धरिये भेश
सतगुरु मिलिया बाहिरे, अंतर रहा अलेख।


अर्थ : प्राणियों का भ्रम जब तक नही मिटता है-भलेही वह अनेक वेश भूषा रख ले-उसे ईश्वर की प्राप्ति वाह्य जगत में भले मिल जाये पर उसकी अंतरात्मा खाली ही रह जाती है।

भीतर तो भेदा नहीं, बाहिर कथै अनेक
जो पाई भीतर लखि परै, भीतर बाहर एक।


अर्थ : हृदय में परमात्मा एक हैलेकिन बाहर लोग अनेक कहते है। यदि हृदय के अंदर परमात्मा का दर्शण को जाये तो वे बाहर भीतर सब जगह एक ही हो जाते है।

भेश देखि मत भुलिये, बुझि लिजिये ज्ञान
बिन कसौटी होत नहि, कंचन की पेहचान।

अर्थ : संत की वेश भूषा देख कर शंकित मत हो। पहले उनके ज्ञान के संबंध में समझ बुझ लो सोने की पहचान बिना कसौटी पर जाॅच किये नहीं हो सकती है।

भोग मोक्ष मांगो नहि, भक्ति दान हरि देव
और नहि कछु चाहिये, निश दिन तेरी सेव।


अर्थ : प्रभु मैं आप से किसी प्रकार भोग या मोक्ष नही चाहता हॅू। मुझे आप भक्ति का दान देने की कृपा करैं। मुझे अन्य किसी चीज की इच्छा नहीं है। केवल प्रतिदिन मैं आपकी सेवा करता रहूॅं।

भौसागर की तरास से, गुरु की पकरो बांहि
गुरु बिन कौन उबारसि, भौजाल धरा माहि।

अर्थ : इस संसार सागर के भय से त्राण के लिये तुम्हें गुरु की बांह पकड़नी होगी। तुम्हें गुरु के बिना इस संसार सागर के तेज धारा से बचने में और कोई सहायक नहीं हो सकता है।

भूला भसम रमाय के, मिटी ना मन की चाह
जो सिक्का नहि सांच का, तब लग जोगी नाहं।


अर्थ : अपने शरीर में भस्म लगा कर जो भूल गया है पर जिसके मन की इच्छायें नहीं मिटी है-वह सच्चा सिक्का नहीं है वह वास्तव में योगी संत नहीं है।

बोले बोल बिचारि के, बैठे ठौर सम्हारि
कहे कबीर ता दास को, कबहु ना आबै हारि।


अर्थ : खूब सोच समझ विचार कर बोलो और सही ढं़ग से उचित स्थान पर ही बैठो। कबीर कहते है कि ऐसा व्यक्ति हार कर नहीं लौटता है।

बूझ सरीखी बात हैं, कहाॅ सरीखी नाहि
जेते ज्ञानी देखिये, तेते संसै माहि।


अर्थ : परमांत्मा की बातें समझने की चीज है। यह कहने के लायक नहीं है। जितने बुद्धिमान ज्ञानी हैं वे सभी अत्यंत भ्रम में है।

बूँद पड़ी जो समुंदर में, जानत है सब कोय ।
समुंदर समाना बूँद में, बूझै बिरला कोय ॥


अर्थ: एक बूँद का सागर में समाना – यह समझना आसान है, लेकिन सागर का बूँद में समाना – इसकी कल्पना करना बहुत कठिन है। इसी तरह, सिर्फ भक्त भगवान् में लीन नहीं होते, कभी-कभी भगवान् भी भक्त में समा सकते हैं।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

चाकी चली गुपाल की, सब जग पीसा झार
रुरा सब्द कबीर का, डारा पात उखार।


अर्थ : परमात्मा के चलती चक्की में संसार के सभी लोग पिस रहे है। लेकिन कबीर का प्रवचन बहुत ताकतवर है। जो भ्रम और माया के पाट पर्दा को ही उघार देता है और मोह
माया से लोगो की रक्षा हो जाती है|

चाल बकुल की चलत है, बहुरि कहाबै हंस
ते मुक्ता कैसे चुगे, परे काल की फांस।


अर्थ : जिसका चाल चलन बगुले की तरह छल कपट वाला है लेकिन संसार की नजर में वह हंस जैसा अच्छा कहलाता है-वह मुक्ति का मोती नहीं चुग सकता है। वह मृत्यु के फांस में अवश्य गिरेगा।

चार च्ंन्ह हरि भक्ति के, परगट देखै देत
दया धरम आधीनता, पर दुख को हरि लेत।


अर्थ : प्रभु के भक्ति के चार लक्षण हैं जो स्पष्टतः दिखाई देते हैं। दया,र्धम,गुरु एंव ईश्वर की अधिनता तथ् दुख का तरता- तब प्रभु उसे अपना लेते है।

चंदन जैसे संत है, सरुप जैसे संसार
वाके अंग लपटा रहै, भागै नहीं बिकार।


अर्थ : संत चंदन की भाॅंति होते है और यह संसार साॅंप की तरह विषैला है। किंतु साॅंप यदि संत के शरीर में बहुत दिनों तक लिपटा रहे तब भी साॅंप का विष-विकार समाप्त नहीं होता है।

चहुॅ दिस ठाढ़े सूरमा, हाथ लिये हथियार
सब ही येह तन देखता, काल ले गया मार।


अर्थ : चारों दिशाओं में वीर हाथों में हथियार लेकर खड़े थे। सब लोग अपने शरीर पर गर्व कर रहे थे परंतु मृत्यु एक ही चोट में शरीर को मार कर ले गये।

चली जो पुतली लौन की, थाह सिंधु का लेन ।
आपहू गली पानी भई, उलटी काहे को बैन ॥


अर्थ: जब नमक सागर की गहराई मापने गया, तो खुद ही उस खारे पानी मे मिल गया। इस उदाहरण से कबीर भगवान् की विशालता को दर्शाते हैं। जब कोई सच्ची आस्था से भगवान् खोजता है, तो वह खुद ही उसमे समा जाता है।

चलो चलो सब कोये कहै, पहुचै बिरला कोये
ऐक कनक औरु कामिनि, दुरगम घाटी दोये।


अर्थ : परमात्मा तक जाने के लिये सभी चलो-चलो कहते है पर वहाॅ तक शायद ही कोई पहूॅच पाता है। धन और स्त्री रुपी दो अत्यंत खतरनाक बीहड़ घाटियों को पार कर के ही
कोई परमात्मा की शरण में पहूॅच सकता है।

चलती चाकी देखि के, दिया कबीरा रोये
दो पाटन बिच आये के, साबुत गया ना कोये।


अर्थ : चलती चक्की को देखकर कबीर रोने लगे। चक्की के दो पथ्थरों के बीच कोई भी पिसने से नहीं बच पाया। संसार के जन्म मरण रुपी दो चक्को के बीच कोई भी जीवित नहीं रह सकता है।

चतुर विवेेकी धीर मत, छिमावान, बुद्धिवान
आज्ञावान परमत लिया, मुदित प्रफुलित जान।


अर्थ : एक भक्त समझदार,विवेकी,स्थिर विचार,क्षमाशील,बुद्धिमान,आज्ञाकारी,ज्ञानी एंव मन से सदा खुस रहने वाला होता है। ये सब भक्तके लक्षण हंै।

चतुराई हरि ना मिलय, येह बातों की बात
निसप्रेही निर्धार का, गाहक दीनानाथ।


अर्थ : चतुराई से प्रभु की प्राप्ति संभव नहीं है। यह एक मूल बात है। एक निर्मोही एवं निराधार को प्रभु दीनानाथ अपना बना लेते है।

चिड़िया चोंच भरि ले गई, घट्यो न नदी को नीर ।
दान दिये धन ना घटे, कहि गये दास कबीर ॥

अर्थ: जिस तरह चिड़िया के चोंच भर पानी ले जाने से नदी के जल में कोई कमी नहीं आती, उसी तरह जरूरतमंद को दान देने से किसी के धन में कोई कमी नहीं आती ।

चिंता ऐसी डाकिनी, काट कलेजा खाए ।
वैद बेचारा क्या करे, कहा तक दवा लगाए ॥


अर्थ: चिंता एक ऐसी चोर है जो सेहत चुरा लेती है। चिंता और व्याकुलता से पीड़ित व्यक्ति का कोई इलाज नहीं कर सकता।

छोटी मोटी कामिनि, सब ही बिष की बेल
बैरी मारे दाव से, येह मारै हंसि खेल।


अर्थ : स्त्री छोटी बड़ी सब जहर की लता है। दुश्मन दाव चाल से मारता है पर स्त्री हंसी खेल से मार देती है।

दाढ़ी मूछ मूराय के, हुआ घोटम घोट
मन को क्यों नहीं मूरिये, जामै भरीया खोट।


अर्थ : दाढ़ी मूछ मुरबाकर साधु का वेश बना लेना सरल है। तुम अपने मन को मूर कर साफ करो जिस में अनेक बिकार खोट अज्ञाान पाप भरा हुआ है।

दया भाव ह्रदय नहीं , ज्ञान थके बेहद |
ते नर नरक ही जायेंगे , सुनी सुनी साखी शब्द ||


अर्थ : कुछ लोगों में न दया होती है और न हमदर्दी, मगर वे दूसरों को उपदेश देने में माहिर होते हैं। ऐसे व्यक्ति, और उनका निरर्थक ज्ञान नर्क को प्राप्त होता है।

दया गरीबी दीनता सुमता सील करार
ये लच्छन है भक्ति के कहे कबीर बिचार।


अर्थ : दया, गरीबों पर दीनता, नम्रता,सुख-दुख में समता और सदाचार भक्ति के लक्षण हैं। कबीर का यह सुविचारित मत है।

धरती करते एक पग, करते समुद्रा फाल
हाथों पर्वत तौलते, ते भी खाये काल।


अर्थ : बामन ने एक कदम में जगत को माप लिया। हनुमान ने एक छलांग में समुद्र को पार कर लिया। कृष्ण ने एक हाथ पर पहाड़ को तौल लिया लेकिन मृत्यु उन सबों को भी खा गया।

देखा देखी भक्ति का, कबहुॅ ना चढ़सी रंग
बिपति पराई यों छारसी, केचुली तजत भुजंग।


अर्थ : दूसरो का देखा-देखी नकल से भक्ति नहीं आ सकती है। दुख-विपत्ति में लोग भक्ति इस प्रकार छोड़ देते है जैसे साॅंप अपनी केंचुल छोड़ता है।

दूजा हैं तो बोलिये, दूजा झगड़ा सोहि
दो अंधों के नाच मे, का पै काको मोहि।


अर्थ : यदि परमात्मा अलग अलग हों तो कुछ कहाॅ जाय। यही तो सभी झगड़ों की जड़ है। दो अंधों के नाच में कौन अंधा किस अंस अंधे पर मुग्ध या प्रसन्न होगा?

दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥


अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि दुःख के समय सभी भगवान् को याद करते हैं पर सुख में कोई नहीं करता। यदि सुख में भी भगवान् को याद किया जाए तो दुःख हो ही क्यों !

गये रोये हंसि खेलि के, हरत सबौं के प्रान
कहै कबीर या घात को, समझै संत सुजान।

अर्थ : गाकर,रोकर, हंसकर या खेल कर नारी सब का प्राण हर लेती है। कबीर कहते है की इसका आघात या चोट केवल संत और ज्ञानी ही समझते है।

एक अनुपम हम किया, साकट सो व्यवहार
निन्दा सती उजागरो, कियो सौदा सार।

अर्थ : मैने एक अज्ञानी से लेनदेन का व्यवहार कर के अच्छा सौदा किया। उसके द्वारा मेरे दोषों को उजागर करने से मैं पवित्र हो गया। यह व्यापार मेरे लिये बहुत लाभदायी रहा।

ऐक घड़ी आधो घड़ी, आधो हुं सो आध
कबीर संगति साधु की, कटै कोटि अपराध।


अर्थ : एक क्षण,आध क्षण, आधे का भी आधा क्षण के लिये यदि साधु संतों की संगति की जाये तो हमारे करोड़ों अपराध पाप नाश हो जाते है।

ऐक शब्द सों प्यार है, ऐक शब्द कू प्यार
ऐक शब्द सब दुशमना, ऐक शब्द सब यार।


अर्थ : एक शब्द से सबसे प्रेम उत्पन्न होता है एक शब्द सबको प्यारा लगता है। एक शब्द सबको दुशमन बना देता है और एक शब्द ही सबको मित्र बना देता है। वाणी का सामथ्र्य बहुत है।

ऐक शीश का मानवा, करता बहुतक हीश
लंका पति रावन गया, बीस भुजा दस शीश।


अर्थ : एक सिर का मनुष्य बहुत अहंकार और धमंड करता है जब कि लंका का राजा रावन बीस हाथ और दस सिर का रहने पर भी चला गया तो दूसरों का क्या कहना है।

गिरही सेबै साधु को, साधु सुमिरै राम
यामे धोखा कछु नाहि, सारै दौउ का काम।


अर्थ : एक पारिवारिक गृहस्थ को संतों की सेवा करनी चाहिये और संत को केवल राम का सुमिरन करना चाहिये। इस में कोई भ्रम या धोखा नहीं है। दोनो का यही काम है और इसी मे दोंनो का कल्याण है।

गुरु आज्ञा लै आबही, गुरु आज्ञा लै जाये
कहै कबीर सो संत प्रिया, बहु बिध अमृत पाये।


अर्थ : जो गुरु की आज्ञा से ही कहीं आता जाता है वह संतो का प्रिय होता है। उसे अनेक प्रकार से अमृत की प्राप्ति होती है।

गुरु आज्ञा मानै नहीं, चलै अटपटी चाल
लोक वेद दोनो गये, आगे सिर पर काल।

अर्थ : जो गुरु के आदेशों को नहीं मानता है और मनमाने ठंग से चलता है उसके दोनों लोक परलोक व्यर्थ हो जाते है और भविश्य में काल मौत उसके सिर मंडराता रहता है।

गुरु बिन अहनिश नाम ले, नहि संत का भाव
कहै कबीर ता दास का, परै ना पूरा दाव।


अर्थ : जो गुरु के निर्देश बिना दिन रात प्रभु का नाम लेता है और जिसके दिल में संत के प्रति प्रेम भाव नहीं है। कबीर कहते है की उस व्यक्ति का मनोरथ कभी पूरा नही होता है।

गुरु बिन माला फेरते, गुरु बिन देते दान
गुरु बिन सब निस्फल गया, पुछौ वेद पुरान।


अर्थ : गुरु की शिक्षा के बिना माला फेरने और दान देने से कोई फल नहीं मिलने वाला है। यह बात वेद पुराण आदि प्राचीन धर्म ग्रंथों में भी कही गयी है।

गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥


अर्थ: यदि गुरु और ईश्वर, दोनों साथ में खड़े हों, तो किसे पहले प्रणाम करना चाहिए? कबीर कहते हैं, गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊपर है, क्योंकि गुरु की शिक्षा के कारण ही भगवान् के दर्शन होते हैं

गुरु जहाज हम पाबना,गुरु मुख पारि पराय
गुरु जहाज जाने बिना, रोबै घट खराय।


अर्थ : कबीर कहते है की मैंने गुरु रुपी जहाज को प्राप्त कर लिया है। जिसे यह जहाज मिल गया है वह निश्चय इस भव सागर को पार कर जायेगा। जिसे यह गुरु रुपी जहाज नहीं मिला वह किनारे खड़ा रोता रहेगा। गुरु के बिना मोक्ष संभव नहीं है।

गुरु को चेला बिश दे, जो गठि होये दाम
पूत पिता को मारसी ये माया को काम।


अर्थ : यदि शिष्य के पास पैसा हो तो वह गुरु को भी जहर दे सकता है। पुत्र पिता की हत्या कर सकता है। यही माया की करनी है।

गुरुमुख गुरु आज्ञा चलै, छाड़ी देयी सब काम
कहै कबीर गुरुदेव को, तुरत करै प्रनाम।


अर्थ : गुरु का सच्चा शिष्य उनके आज्ञा के अनुसार ही सब काम को छोड़ कर चलता है। कबीर कहते है की वह गुरुदेव देखकर तुरंत झुक कर प्रणाम करता है।

घड़ी जो बाजै राज दर, सुनता हैं सब कोये
आयु घटये जोवन खिसै, कुशल कहाॅ ते होये।


अर्थ : राज दरवार में घड़ी का घंटा बज रहा है। सभी लोग उसे सुन रहे है। लोगो की आयु कम हो रही है। यौवन भी खिसक रहा है-तब जीवन का कल्याण कैसे होगा l

ज्ञानी मूल गँवाईया, आप भये करता ।
ताते संसारी भला, जो सदा रहे डरता ॥


अर्थ: जो विद्वान अहंकार में पड़कर खुद को ही सर्वोच्च मानता है, वह कहीं का नहीं रहता। उससे तो वह संसारी आदमी बेहतर है, जिसके मन में भगवान् का डर तो है।

ज्ञानी तो निर्भय भया, मानै नहीं संक
इन्द्रिन केरे बसि परा, भुगते नरक निशंक।


अर्थ : ज्ञानी हमेशा निर्भय रहता है। कारण उसके मन में प्रभु के लिये कोई शंका नहीं होता। लेकिन यदि वह इंद्रियों के वश में पड़ कर बिषय भोग में पर जाता है तो उसे निश्चय ही नरक भोगना पड़ता है।

ज्ञानी युक्ति सुनाईया, को सुनि करै विचार
सूरदास की स्त्री, का पर करै सिंगार।


अर्थ : एक ज्ञानी व्यक्ति जो परामर्श तरीका बतावें उस पर सुन कर विचार करना चाहिये। परंतु एक अंधे व्यक्ति की पत्नी किस के लिये सज धज श्रंृगार करेगी।

हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी, केस जलै ज्यूं घास
सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास


अर्थ: यह नश्वर मानव देह अंत समय में लकड़ी की तरह जलती है और केश घास की तरह जल उठते हैं. सम्पूर्ण शरीर को इस तरह जलता देख, इस अंत पर कबीर का मन उदासी से भर जाता है |

हरि का गुन अति कठिन है, उॅंचा बहुत अकथ्थ
सिर काटि पगतर धरै, तब जा पंहुॅचैय हथ्थ।


अर्थ : प्रभु के गुण दुर्लभ,कठिन,अवर्णनीय और अनंत हैं। जो सम्पूर्ण आत्म त्याग कर प्रभु के पैर पर समर्पण करेगा वही प्रभु के निकट जाकर उनके गुणों को समझ सकता है।

हरि कृपा तब जानिये, दे मानव अवतार
गुरु कृपा तब जानिये, छुराबे संसार।


अर्थ : प्रभु की कृपा हम तब जानते है जब उन्हांेने हमें मनुष्य रुप में जन्म दिया है। गुरु की कृपा तब जानते है जब वे हमें इस संसार के सभी बंधनों से मुक्ति दिलाते है।

हरि रस पीया जानिये, कबहू न जाए खुमार ।
मैमता घूमत फिरे, नाही तन की सार ॥ 


अर्थ: जिस व्यक्ति ने परमात्मा के अमृत को चख लिया हो, वह सारा समय उसी नशे में मस्त रहता है। उसे न अपने शरीर कि, न ही रूप और भेष कि चिंता रहती है।

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना |

हम तुम्हरो सुमिरन करै, तुम हम चितबौ नाहि
सुमिरन मन की प्रीति है, सो मन तुम ही माहि।


अर्थ : हम ईश्वर का सुमिरण करते हैं परंतु प्रभु मेरी तरफ कभी नहीं देखते है। सुमिरण मन का प्रेम है और मेरा मन सर्वदा तुम्हारे ही पास रहता है।

जा घर हरि भक्ति नहीं, संत नहीं मिहमान
ता घट जम डेरा दिया, जीवत भये मसान।


अर्थ : जिस घर में ईश्वर की उपासना नहीं होती है और संत अतिथि नहीं माने जाते हैं उस घर में मृत्यु के देवता यमराज का वास रहता है और वह श्मसान की भाॅंति है।

जाता है सो जान दे, तेरी दासी ना जाये
दरिया केरे नाव ज्यों, घना मिलेंगे आये।


अर्थ : जो जा रहा है उसे जाने दो-तेरा क्या जा राहा है? जैसे नदी में नाव जा रही है तो फिर बहुत से लोग तुम्हें मिल जायेंगे। आवा गमन-मृत्यु जन्म की चिंता नहीं करनी है।

जाति बरन कुल खोये के, भक्ति करै चित लाय
कहे कबीर सतगुरु मिले, आबागमन नसाये।


अर्थ : जाति-वर्ण-वंश के विचार से मुक्त होकर पूरे मनोयोग से भक्ति करने से प्रभु की प्राप्ति और आवागमन एंव पुनर्जन्म से मुक्ति हो सकती है।

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई,
जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई |


अर्थ: कबीर कहते हैं कि जब गुण को परखने वाला गाहक मिल जाता है तो गुण की कीमत होती है. पर जब ऐसा गाहक नहीं मिलता, तब गुण कौड़ी के भाव चला जाता है |

जब लग आसा देह की, तब लगि भक्ति ना होये
आसा त्यागि हरि भज, भक्त कहाबै सोये।


अर्थ : जब तक हमें अपने शरीर से आसक्ति है तब तक भक्ति संभव नहीं है। यदि समस्त आशाओं-इच्छााओं को त्याग कर प्रभु की भक्ति करें तो वही वास्तविक भक्त है।

जब लग नाता जाति का, तब लग भक्ति ना होये
नाता तोरै हरि भजै, भक्त कहाबै सोये।


अर्थ : जब तक जाति और वंश का अभिमान है प्रभु की भक्ति नहीं हो सकती है। इन सारे संसारिक संबंधों को जो तोड़ देगा वही सच्चा भक्त है।

जबही नाम हिरदे घरा, भया पाप का नाश ।
मानो चिंगरी आग की, परी पुरानी घास ॥


अर्थ : शुद्ध हृदय के साथ भगवान् को याद करने से सारे पाप ऐसे नष्ट हो जाते हैं, जैसे कि सूखी घास पर आग की चिंगारी पड़ी हो।

जग में बैरी कोई नहीं , जो मन शीतल होय |
यह आपा तो डाल दे , दया करे सब कोए ||


अर्थ: आपके मन में यदि शीतलता है, अर्थात दया और सहानुभूति है, तो संसार में आपकी किसी से शत्रुता नहीं हो सकती। इसलिए अपने अहंकार को निकाल बाहर करें, और आप अपने प्रति दूसरों में भी समवेदना पाएंगे।

जहाँ दया तहाँ धर्म है,जहाँ लोभ तहाँ पाप ।
जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप ॥


अर्थ : जहाँ दया-भाव है, वहाँ धर्म-व्यवहार होता है। जहाँ लालच और क्रोध है वहाँ पाप बसता है। जहाँ क्षमा और सहानुभूति होती है, वहाँ भगवान् रहते हैं।

जहाँ न जाको गुन लहै, तहाँ न ताको ठाँव ।
धोबी बसके क्या करे, दीगम्बर के गाँव ॥


अर्थ: जहाँ पर आपकी योग्यता और गुणों का प्रयोग नहीं होता, वहाँ आपका रहना बेकार है। उदाहरण के लिए, ऐसी जगह धोबी का क्या काम, जहाँ पर लोगों के पास पहनने को कपड़े नहीं हैं।

जैसा भोजन खाइये , तैसा ही मन होय ।
जैसा पानी पीजिये, तैसी वाणी होय ॥


अर्थ : शुद्ध-सात्विक आहार तथा पवित्र जल से मन और वाणी पवित्र होते हैं। अर्थात, जो जैसी संगति करता है वैसा ही बन जाता है।

जल ज्यों प्यारा माछली, लोभी प्यारा दाम
माता प्यारा बालका, भक्ति प्यारी राम।


अर्थ : जिस प्रकार जल मछली को, धन लोभी मनुष्य को तथा पुत्र अपने माता को प्यारा होता है, उसी प्रकार भक्त को प्रभु की भक्ति प्यारी होती है।

जंतर मंतर सब झूठ है, मति भरमो जग कोये
सार शब्द जाने बिना, कागा हंस ना होये।


अर्थ : तंत्र, मंत्र, यंत्र सब झूठी बातें हैं। इन सब चीजों से संसार को भ्रमित मत करो। जीवन के मूल तत्व और मंत्र को जाने बिना कौआ कभी हॅंस नहीं बन सकता है।

जप माला छापा तिलक, सरै ना ऐको काम
मन कंचे नाचे बृथा, संचे रचे राम।


अर्थ : जप माला तिलक लगाना आदि से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होता है। अपरिपक्व मन से माला गिनने और नाचने से नहीं होगा। प्रभु तो केवल सच्चे प्रेमी को ही मिलते है।

जेता मीठा बोलना तेता साधु ना जान
पहिले थाह देखि करि, औंदेय देसी आन।

अर्थ : प्रत्येक मीठा बोलने वालों को साधु नहीं समझैं। प्रारम्भ में वे बहुत अपनापन दिखाते है और बाद में वे दूसरा रुप लेलेते है।

जिभ्या जिन बस मे करि, तिन बस कियो जहान
नहि तो अवगुन उपजै, कहि सब संत सुजान।


अर्थ : जिसने अपने जिहवा को नियंत्रित कर लिया है वह वस्तुतः संसार को जीत लिया है। अन्यथा अनेक अवगुण और पाप पैदा होते हैं- ऐसा ज्ञानी संतों का विचार है।

जिहवा मे अमृत बसै, जो कोई जाने बोल
बिष बासुकि का उतरै, जिहवा तानै हिलोल।


अर्थ : जीभ में अमृत का बास है यदि लोग सही बोलना जानें। यह बासुकी नाग के जहर को भी अपने मीठी बोली के प्रभाव से खींच लेता है।

झूठा सुख को सुख कहै, मानत है मन मोद
जगत चबेना काल का, कछु मुथी कछु गोद।


अर्थ : झूठे सुख को लोग सुख कहते है और मन ही मन प्रसन्न होते है। यह संसार मृत्यु का चवेना है। मृत्यु कुछ को अपनी मुठ्ठी और कुछ को गोद में रख कर
लगातार चवा रहा है।

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।

जो मानुष गृहि धर्मयुत, राखै शील विचार
गुरुमुख बानी साधु संग, मन बच सेवा सार।


अर्थ : जो गृहस्थ धर्म में रह कर अच्छा विचार व्यवहार रखता है, गुरु के शिक्षा का पालन, साधु की संगति, मन वचन से सेवा में रत रहता है-उसका गृस्थ जीवन सफल है।

जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं।
जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।।


अर्थ: इस संसार का नियम यही है कि जो उदय हुआ है,वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा. जो चिना गया है वह गिर पड़ेगा और जो आया है वह जाएगा |

ज्यों गूंगा के सैन को, गूंगा ही पहिचान
त्यों ज्ञानी के सुख को, ज्ञानी हबै सो जान।


अर्थ : गूंगे लोगों के इशारे को एक गूंगा ही समझ सकता है। इसी तरह एक आत्म ज्ञानी के आनंद को एक आत्म ज्ञानी ही जान सकता है।

ज्यों तिल मांही तेल है, ज्यों चकमक में आग ।
तेरा साईं तुझमे है, तू जाग सके तो जाग ॥


अर्थ : जिस तरह तिल में तेल होता है, और पत्थरों से आग उत्पन्न हो सकती है, उसी प्रकार भगवान् भी आपके अंतर्गत हैं। उन्हें जगाने की शक्ति पैदा करने की आवश्यकता है।

काल छिछाना है खड़ा, जग पियारे मीत
राम सनेही बाहिरा, क्यों सोबय निहचिंत।


अर्थ :मृत्यु रुपी बाज तुम पर झपटने के लिये खड़ा है। प्यारे मित्रों जागों। परम प्रिय स्नेही भगवान बाहर है। तुम क्यों निश्चिंत सोये हो। भगवान की भक्ति बिना तुम निश्चिंत मत सोओ।

काल हमारे संग है, कश जीवन की आस
दस दिन नाम संभार ले,जब लगि पिंजर सांश।


अर्थ : मृत्यु सदा हमारे साथ है। इस जीवन की कोई आशा नहीं है। केवल दस दिन प्रभु का नाम सुमिरन करलो जब तक इस शरीर में सांस बचा है।

काल जीव को ग्रासै, बहुत कहयो समुझाये
कहै कबीर मैं क्या करुॅ, कोयी नहीं पतियाये।


अर्थ : मृत्यु जीव को ग्रस लेता है-खा जाता है। यह बात मैंने बहुत समझाकर कही है। कबीर कहते है की अब मैं क्या करु-कोई भी मेरी बात पर विश्वास नहीं करता है।

काल काल सब कोई कहै, काल ना चिन्है कोयी
जेती मन की कल्पना, काल कहाबै सोयी।


अर्थ : मृत्यु मृत्यु सब कोई कहते है पर इस मृत्यु को कोई नहीं पहचानता है। जिसके मन में मृत्यु के बारे में जैसी कल्पना है-वही मृत्यु कहलाता है।

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।
पल में प्रलय होएगी,बहुरि करेगा कब ॥


अर्थ: कबीर दास जी समय की महत्ता बताते हुए कहते हैं कि जो कल करना है उसे आज करो और और जो आज करना है उसे अभी करो , कुछ ही समय में जीवन ख़त्म हो जायेगा फिर तुम क्या कर पाओगे |

काल पाये जग उपजो, काल पाये सब जाये
काल पाये सब बिनसि है, काल का voल कंह खाये।


अर्थ : अपने समय पर सृष्टि उत्पन्न होती है। अपने समय पर सब का अंत हो जाता है। समय पर सभी जीचों का विनाश हो जाता है। काल भी काल को-मृत्यु भी समय को खा जाता है।

काल फिरै सिर उपरै, हाथौं धरी कमान
कहै कबीर गहु नाम को, छोर सकल अभिमान।


अर्थ : मृत्यु हाथों में तीर धनुष लेकर सबों के सिर पर चक्कर लगा रही है।समस्त घमंड अभिमान छोड़ कर प्रभु के नाम को पकड़ो-ग्रहण करो-तुम्हारी मुक्ति होगी।

काल फिरै सिर उपरै, जीवहि नजरि ना जाये
कहै कबीर गुरु शब्द गहि, जम से जीव बचाये।


अर्थ : सिर के उपर मृत्यु नाच रहा है किंतु मनुष्य इसे देख नहीं पा राहा है। यहि गुरु के उपदेशों को अच्छी तरह अपनावें तो जीव काल से बच सकता है।

कामी क्रोधी लालची, इनसे भक्ति ना होये
भक्ति करै कोई सूरमा, जाति वरन कुल खोये।


अर्थ : कामी, क्रोधि और लोभी से भक्ति नहीं संभव है। कोई सूरमा ही वीर होगा जो जाति ,कुल और वर्ण के घमंड को त्यागकर प्रभु की भक्ति कर सकता है।

कबीर चंदन के भिरे, नीम भी चंदन होये
बुरो बंश बराईया, यों जानि बुरु कोये।


अर्थ : कबीर कहते है की च्ंादन के संसर्ग में नीम भी चंदन हो जाता है पर बाॅंस अपनी अकड़ घमंड के कारण कभी चंदन नहीं होता है। हमें धन विद्या आदि के अहंकार में कभी नहीं पड़ना चाहिये।

कबीर दुनिया से दोस्ती, होेये भक्ति मह भंग
एंका ऐकी राम सो, कै साधुन के संग।


अर्थ : कबीर का कहना है की दुनिया के लोगों से मित्रता करने पर भक्ति में बाधा होती है। या तो अकेले में प्रभु का सुमिरन करो या संतो की संगति करो।

कबीर गाफील क्यों फिरय, क्या सोता घनघोर
तेरे सिराने जाम खड़ा, ज्यों अंधियारे चोर।


अर्थ : कबीर कहते है की ऐ मनुष्य तुम भ्रम में क्यों भटक रहे हो? तुम गहरी नीन्द में क्यों सो रहे हो? तुम्हारे सिरहाने में मौत खड़ा है जैसे अंधेरे में चोर छिपकर रहता है।

कबीर गुरु और साधु कु, शीश नबाबै जाये
कहै कबीर सो सेवका, महा परम पद पाये।


अर्थ : कबीर का कथन है की जो नित्य नियमतः गुरु और संत के चरणों में सिर झुकाता है वही गुरु का सच्चा सेवक महान पद प्राप्त कर सकता है।

कबीर गुरु की भगति बिनु, राजा रसम होये
माटिृ लड़ै कुमहार की,घास ना डारै कोये।


अर्थ : कबीर कहते है की गुरु की भक्ति बिना एक राजा गद्हा के समान है। उसके उपर कुम्हार की मिटृी लादी जाती है और उसे कोई घास भी नहीं देता है। गुरु ज्ञान के बिना राजा भी महत्वहीन है।

कबीर हरि भक्ति बिन धिक जीवन संसार
धुवन कासा धुरहरा, बिनसत लागे ना बार।


अर्थ : कबीर का मत है कि प्रभु की भक्ति के बिना इस संसार में जीवन को धिक्कार है। यह संसार वो धुआॅं के घर है जो किसी क्षण नाश हो जाता है।

कबीर हरि भक्ति करु, तजि विषय रस चैस
बार बार ना पाईये मानुस जनम की मौज।


अर्थ : कबीर कहते है की भक्ति इस तरह करो कि विषय-बासना के भोगों को त्याग कर दो। इस मानव जीवन को तुम पुनः जनम नहीं कर पावोगे।

कबीर हरि की भक्ति से, संसय डारा धोये
भक्ति बिना जो दिन गया, सो दिन साले मोये।


अर्थ : कबीर को प्रभु की भक्ति से सभी संसारिक भ्रम और संशय मिट गये हैं। जिस दिन वे ईश्वर की उपासना नहीं करते हैं तो उन्हें अत्यधिक कष्ट होता है।

कबीर हरि सो हेत कर, कोरै चित ना लाये
बंधियो बारि खटीक के, ता पशु केतिक आये।


अर्थ : कबीर कहते है की प्रभु से प्रेम करो। अपने चित्त में कूड़ा कचरा मत भरों। एक पशु कसाई के द्वार पर बांध दिया गया है-समझो उसकी आयु कितनी शेष बची है।

कबीर जीवन कुछ नहीं, खिन खारा खिन मीठ
कलहि अलहजा मारिया, आज मसाना ठीठ।


अर्थ : कबीर कहते है की यह जीवन कुछ नहीं है। इस क्षण मे खारा और तुरत जीवन मीठा हो जाता है। जो योद्धा वीर कल मार रहा था आज वह स्वयं श्मसान में मरा पड़ा है।

कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस,
ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस |


अर्थ: कबीर कहते हैं कि हे मानव ! तू क्या गर्व करता है? काल अपने हाथों में तेरे केश पकड़े हुए है. मालूम नहीं, वह घर या परदेश में, कहाँ पर तुझे मार डाले.

कबीर कुत्ता राम का, मोतिया मेरा नाव
डोरी लागी प्रेम की, जित खैंचे तित जाव।


अर्थ : कबीर कहते है की वे राम का कुत्ता है। उनका नाम मोतिया है। उन के गले में प्रेम की रस्सी बांधी गई है। उन्हें जिधर खींचा जाता है। वे उधर ही जाते है।

कबीर क्षुधा कूकरी, करत भजन में भंग ।
वाकूं टुकडा डारि के, सुमिरन करूं सुरंग ॥


अर्थ: संत कबीरदास कहते हैं कि भूख ऐसी कुतिया के समान होती है, जो कि भजन साधना में बाधा डालती है। इसे शांत करने के लिए अगर समय पर रोटी का टुकडा दे दिया जाए तो फिर संतोष और शांति के साथ ईश्वर का स्मरण हो सकता है।

कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई,
बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई |


अर्थ: कबीर कहते हैं कि समुद्र की लहर में मोती आकर बिखर गए. बगुला उनका भेद नहीं जानता, परन्तु हंस उन्हें चुन-चुन कर खा रहा है. इसका अर्थ यह है कि किसी भी वस्तु का महत्व जानकार ही जानता है।

कबीर मन मिरतक भया, इंद्री अपने हाथ
तो भी कबहु ना किजिये, कनक कामिनि साथ।


अर्थ : कबीर कहते है की अगर तुम्हारी इच्छायें मन मर चुका हो और तुम्हारी बिषय भोगों की इन्द्रियाॅ भी तुम्हारे हाथ में नियंत्रित हों तब भी तुम धन और नारी का साथ मत करो।

कबीर माया बेसबा, दोनु की ऐक जात
आबत को आदर करै, जात ना पुछै बात।


अर्थ : कबीर कहते है की माया और वेश्याकी एक जाति है। आने वालो का वह आदर करती है पर जाने वालों से बात तक नहीं पूछती है।

कबीर माया मोहिनी, जैसे मीठी खांर
सदगुरु की कृपा भैयी, नाटेर करती भांर।


अर्थ : कबीर कहते है की समस्त माया और भ्रम चीनी के मिठास की तरह आकर्षक होती है। प्रभु की कृपा है की उसने मुझे बरबाद होने से बचा लिया।

कबीर माया पापिनी, फंद ले बैठी हाट
सब जग तो फंदे परा, गया कबीरा काट।


अर्थ : कबीर कहते है की समस्त माया मोह पापिनी है। वे अनेक फंदा जाल लेकर बाजार में बैठी है। समस्त संसार इस फांस में पड़ा है पर कबीर इसे काट चुके है

कबीर माया पापिनी, हरि सो करै हराम
मुख कदियाली, कुबुधि की, कहा ना देयी राम।


अर्थ : कबीर कहते है की माया पापिनी है। यह हमें परमात्मा से दूर कर देती है। यक मुंह को भ्रष्ट कर के राम का नाम नहीं कहने देती है।

कबीर माया रुखरी, दो फल की दातार
खाबत खर्चत मुक्ति भय, संचत नरक दुआर।


अर्थ : कबीर का कथन है की माया एक बृक्ष की तरह है जो दो प्रकार का फल देती है। यदि माया को अच्छे कार्यों में खर्च किया जाये तो मुक्ति है पर यह संचय करने वाले को नरक के द्वार ले जाती है।

कबीर नारी की प्रीति से, केटे गये गरंत
केटे और जाहिंगे, नरक हसंत हसंत।

अर्थ : कबीर का कथन है की नारी से प्रेम के कारण अनेक लोग बरबाद हो गये और अभी बहुत सारे लोग हंसते-हंसते नरक जायेंगे।

कबीर पगरा दूर है, आये पहुचै सांझ
जन जन को मन राखती, वेश्या रहि गयी बांझ।


अर्थ : कबीर कहते है की मुक्ति बहुत दूर है और जीवन की संध्या आ चुकी है। वह प्रत्येक आदमी का मन पूरा कर देती है पर वेश्या स्वयं बांझ ही रह जाती है।

कबीर पशु पैसा ना गहै, ना पहिरै पैजार
ना कछु राखै सुबह को, मिलय ना सिरजनहार।


अर्थ : कबीर कहते है की पशु अपने पास पैसा रुपया नही रखता है और न ही जूते पहनता है। वह दूसरे दिन प्रातः काल के लिये भी कुछ नहीं बचा कर रखता है। फिर भी उसे सृजन हार प्रभु नहीं मिलते है। वाहय त्याग के साथ विवेक भी आवश्यक है।

कबीर सब सुख राम है, और ही दुख की राशि
सुा, नर, मुनि, जन,असुर, सुर, परे काल की फांसि।


अर्थ : केवल प्रभु समस्त सुख देने वाले है। अन्य सभी दुखों के भंडार है।देवता, आदमी, साधु, राक्षस सभी मृत्यु के फांस में पड़े है। मृत्यु किसी को नहीं छोड़ता।राम ही सुखों के दाता है।

कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय,
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय


अर्थ: कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम आए. सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा.

कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ,
जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ

अर्थ: कबीर कहते हैं कि संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है और जहां उसका मन होता है, शरीर उड़कर वहीं पहुँच जाता है। सच है कि जो जैसा साथ करता है, वह वैसा ही फल पाता है.

कवि तो कोटिन कोटि है, सिर के मुंडै कोट
मन के मुंडै देख करि, ता सेग लीजय ओट।

अर्थ :कवि उपदेशक असंख्य है। सिर मुड़वाने वाले भी कड़ोरों है। परन्तु जिसने अपने मन को मुड़वा लिया हो-माया मोह को मन से त्याग दिया हो-तुम उसकी शरण में जाओ।

कबीर टुक टुक देखता, पल पल गयी बिहाये
जीव जनजालय परि रहा, दिया दमामा आये।

अर्थ : कबीर टुकुर- टुकुर धूर कर देख रहे है। यह जीवन क्षण क्षण बीतता जा रहा है। प्राणी माया के जंजाल में पड़ा हुआ है और काल ने कूच करने के लिये नगारा पीट दिया है।

कबीर वह तो एक है, पर्दा दिया वेश
भरम करम सब दूर कर, सब ही माहि अलेख।


अर्थ :कबीर कहते है की ईश्वर परम तत्व के रुप में एक है। उसने अनेक वेश भूसा में पर्दा कर दिया है। सांसारिक कर्मो के भ्रम जाल को दूर कर देखो। वह परमात्मा सबों में बास करता है।

कबीर वेश अतीत का, अधिक करै अपराध
बाहिर दीशै साधु गति, अंतर बड़ा असाध।


अर्थ : कबीर कहते है की उसका वेश भूसा सन्यासी जैसा है किन्तु वह बड़ा अपराधी है। बाहर से वह साधु जैसा करता है परन्तु अंदर से वह अत्यंत दुष्ट है। ऐसे वेश धारी साधुओं से सावधान रहना चाहिये।

कबीर वेश भगवंत का, माला तिलक बनाये
उनकों आबत देखि के, उठिकर मिलिये धाये।

अर्थ :कबीर कहते है की किसी भगवान के भक्त को माला तिलक के वेश में आता देख कर उठ कर दौड़ कर उन से मिलें। उन की इज्जत प्रतिष्ठा करै।

कबीर या संसार की, झुठी माया मोह
तिहि घर जिता बाघबना, तिहि घर तेता दोह।


अर्थ : कबीर कहते है की यह संसार का माया मोह झूठा है। जिस घर में जितना धन संपदा एवं रंग रेलियाॅं है-वहाॅ उतना ही अधिक दुख और तकलीफ हैै।

कबीरा गर्व ना कीजिये, ऊंचा देख आवास ।
काल पड़ो भू लेटना, ऊपर जमसी घास ॥


अर्थ: अपना शक्ति और संपत्ति देख कर घमंडी मत बनिए। जब इस शरीर से आत्मा निकल जाती हैं तो सबसे शक्तिशाली मनुष्य का देह भी धरती में दाल दिया जाता है, और उसके ऊपर घास उग जाती है।

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर |
ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर ||

कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान ।
जम जब घर ले जाएँगे, पड़ा रहेगा म्यान ॥


अर्थ: अपना सारा समय सोते हुए मत बिताइए। भगवान् को याद कीजिये, क्योंकि यमराज के आने पर (अर्थात मृत्यु के समय ), बिन आत्मा का यह शरीर उस तरह होगा, जैसे बिना तलवार के म्यान।

कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥


अर्थ : जो लोग गुरु और भगवान् को अलग समझते हैं, वे सच नहीं पहचानते। अगर भगवान् अप्रसन्न हो जाएँ, तो आप गुरु की शरण में जा सकते हैं। लेकिन अगर गुरु क्रोधित हो जाएँ, तो भगवान् भी आपको नहीं बचा सकते।

कबीरा तेरी झोपडी, गल कटीयन के पास ।
जैसी करनी वैसे भरनी, तू क्यों भया उदास ॥


अर्थ: कबीर ! तेरा घर कसाई के पास है तो क्या ? उसकी हरकतों के लिए तू ज़िम्मेदार नहीं है। अर्थात, अपने कर्मों का फल सबको खुद ही भुगतना पड़ता है।

कबीरा यह तन जात है , सके तो ठौर लगा |
कई सेवा कर साधू की , कई गोविन्द गुण गा ||


अर्थ: हर व्यक्ति कि मृत्यु तो निश्चित है। इसीलिए अपना जीवन काल उचित एवं लाभकारी कामों में लगाना चाहिए, जैसे कि साधुओं की सेवा और भगवान् कि भक्ति।

कागा काको धन हरै, कोयल काको देत
मीठा शब्द सुनाये के , जग अपनो कर लेत।


अर्थ : कौआ किसी का धन हरण नहीं करता और कोयल किसी को कुछ नहीं देता है। वह केवल अपने मीठी बोली से पूरी दुनिया को अपना बना लेता है।

कागा काय छिपाय के, कियो हंस का भेश
चलो हंस घर आपने, लेहु धनी का देश।


अर्थ: कौये ने अपने शरीर को छिपा कर हंस का वेश धारण कर लिया है। ऐ हंसो-अपने घर चलो। परमात्मा के स्थान का शरण लो। वही तुम्हारा मोक्ष होगा।

कागत लिखै सो कागदी, को व्यहाारि जीव
आतम द्रिष्टि कहां लिखै, जित देखो तित पीव।


अर्थ : कागज में लिखा शास्त्रों की बात महज दस्तावेज है। वह जीव का व्यवहारिक अनुभव नही है। आत्म दृष्टि से प्राप्त व्यक्तिगत अनुभव कहीं लिखा नहीं रहता है। हम तो जहाॅ भी देखते है अपने प्यारे परमात्मा को ही पाते हैं|

कामिनि काली नागिनि, तीनो लोक मंझार
राम सनेही उबरै, विषयी खाये झार।


अर्थ : एक औरत काली नागिन है जो तीनों लोकों में व्याप्त है। परंतु राम का प्रेमी व्यक्ति उसके काटने से बच जाता है। वह विषयी लोभी लोगों को खोज-खोज कर काटती है।

कामिनि सुन्दर सर्पिनी, जो छेरै तिहि खाये
जो हरि चरनन राखिया, तिनके निकट ना जाये।

अर्थ : नारी एक सुन्दर सर्पिणी की भांति है। उसे जो छेरता है उसे वह खा जाती है। पर जो राम के चरणों मे रमा है उसके नजदीक भी वह नहीं जाती है।

कामी कबहु ना हरि भजय, मिटय ना संशय सूल
और गुनाह सब बखशी है, कामी दल ना मूल।


अर्थ : एक कामी पुरुष कभी भगवान का भजन नहीं करता हैं। उसके भ्रम एंव कष्ट का निवारन कभ्री नहीं होता हैै। अन्य लोगों के पाप को क्षमा किया जा सकता है पर लोभी को कभी मांफी नहीं दीजा सकती है।

कहाॅं भयो तन बिछुरै, दुरि बसये जो बास
नैना ही अंतर परा, प्रान तुमहारे पास।


अर्थ : शरीर बिछुड़ने और दूर में वसने से क्या होगा? केवल दृष्टि का अंतर है। मेरा प्राण और मेरी आत्मा तुम्हारे पास है।

कहा सिखापना देत हो, समुझि देख मन माहि
सबै हरफ है द्वात मह, द्वात ना हरफन माहि।


अर्थ : मैं कितनी शिक्षा देता रहूॅ। स्वयं अपने मन में समझों। सभी अक्षर दावात में है पर दावात अक्षर में नहीं है। यह संसार परमात्मा में स्थित है पर परमात्मा इस सृष्टि से भी बाहर तक असीम है।

कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन,
कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन |

कहे कबीर कैसे निबाहे , केर बेर को संग ।
वह झूमत रस आपनी, उसके फाटत अंग ॥


अर्थ : कबीर कहते हैं कि विभिन्न प्रकृति के लोग एक साथ नहीं रह सकते। उदाहरण के लिए, केले और बेर का पेड़ साथ नहीं उग सकते, क्योंकि जब हवा से बेर का पेड़ हिलेगा तो उसके काँटों से केले के पत्ते नष्ट हो जायेंगे।

कहै कबीर गुरु प्रेम बस, क्या नियरै क्या दूर
जाका चित जासो बसै, सो तिहि सदा हजूर।

अर्थ : कबीर के कहते है की जिसके हृदय में गुरु के प्रति प्रेम रहता है। वह न तो कभी दूर न ही निकट होता है। जिसका मन चित्त जहाॅ लगा रहता है। वह सर्वदा गुरु के समझ ही हाजिर रहता है।

कलि मंह कनक कामिनि, ये दौ बार फांद
इनते जो ना बंधा बहि, तिनका हूॅ मै बंद।


अर्थ : कलियुग में जो धन और स्त्री के मोह मे नहीं फंसा है-भगवान उसके हृदय से बंधे हुये है क्योंकि ये दोनों माया मोह के बड़े फंदे है।

कंचन मेरु अरपहि, अरपै कनक भंडार
कहै कबीर गुरु बेमुखी, कबहु ना पाबै पार।


अर्थ : भले आप स्वर्ण भंडार या सोने का पहाड़ दान में दे दें, लुटा दें पर यदि आप गुरु के उपदेसों के प्रति उदासीन हैं तो आप संसार सागर को पार नहीं कर पायेंगे।

करनी बिन कथनी कथे, अज्ञानी दिन रात ।
कूकर सम भूकत फिरे, सुनी सुनाई बात ॥


अर्थ : अज्ञानी व्यक्ति काम कम और बातें अधिक करते हैं। ऐसे लोग खुद अपना तर्क रखने के बजाय सुनी सुनाई बातों को ही रटते रहते हैं।

कपास बिनुथा कापड़ा, कादे सुरंग ना पाये
कबीर त्यागो ज्ञान करि, कनक कामिनि दोये।


अर्थ : जिस प्रकार गंदे कपास से सुन्दर वस्त्र नहीं बन सकता है-कबीर ज्ञान की बात कहते है की हमें स्वणं और स्त्री दोनो का लगाव त्यागना चाहिये।

कर्म फंद जग फांदिया, जप तप पूजा ध्यान
जाहि शब्द ते मुक्ति होये, सो ना परा पहिचान।


अर्थ : पूरी दुनिया जप तप पूजा ध्यान और अन्य कर्मों के जाल में फंसी है परंतु जिस शब्द से मुक्ति संभव है उसे अब तक नहीं जान पाये हैं।

खान खर्च बहु अंतरा, मन मे देखु विचार
ऐक खबाबै साधु को, ऐक मिलाबै छार।


अर्थ : खाने और खर्च करने में बहुत अंतर है। इसे मन में विचार कर देखो। एक आदमी संतों को खिलाता है और दुसरा उसे राख में फ़ेंक देता है। संत को खिलाकर परोपकार करता है और मांस मदिरा पर खर्च कर के धन का नाश करता है।

खाय पकाय लूटाय ले, करि ले अपना काम ।
चलती बिरिया रे नरा, संग न चले छदाम ॥


अर्थ: मनुष्य को इस जीवन में अपनी शक्ति और साधन का भरपूर प्रयोग करना चाहिए – अपने कामों के लिए, दूसरों कि सहायता के लिए और परोपकार के कार्यों में। इस तरह उसे अपना जीवन सार्थक करना चाहिए, क्योंकि संसार से जाते समय एक भी वस्तु उसके साथ नहीं जायेगी।

खोद खाये धरती सहै, काट कूट वनराये
कुटिल वचन साधु सहै, और से सहा ना जाये।


अर्थ : धरती खोदना-जोतना-कोड़ना सहती है। जंगल काट कूट सहती है। साधु कुटिल-दुष्ट वचन सहते है। अन्य लोगों से इस प्रकार की बाते नहीं सही जाती है।

खशम कहाबै वैषनव, घर मे साकट जोये
एक घड़ा मे दो मता, भक्ति कहां ते होये।


अर्थ : पति ईष्वर का भक्त वैष्वनव और पत्नी बेबकूफ मूर्ख हो तो एक ही घर में दो मतों विचारों के कारण भक्ति कैसे संभव हो सकती है।

केता बहाया बहि गया, केता बहि बहि जाये
एैसा भेद विचारि के, तु मति गोता खाये।

अर्थ : कितने लोग इस भव सागर मे बह गये और अभी भी कितने बह रहे है। इस रहस्य पर विचार करो। तुम इस बिषय वासना में डूबकी मत लगाओ।

कोइ एक राखै सावधां, चेतनि पहरै जागि ।
बस्तर बासन सूं खिसै, चोर न सकई लागि ॥


अर्थ : जो हर पहर जागता रहता है, उसके कपड़े और बर्तन कोई नहीं ले जा सकता। अर्थात, हमेशा सचेत और सावधान रहना चाहिए।

कोयला भी होये उजल, जरि बरि है जो सेत
मुरख होय ना उजला, ज्यों कालर का खेत।


अर्थ : कोयला भी अच्छी तरह जल कर उजला हो जाता है परंतु मूर्ख कभी भी उज्जवल नहीं होता जैसे कि एक वंजर भूमि में बीज नहीं उगता है।

कुशल कुशल जो पूछता, जग मे रहा ना कोये
जरा मुअई ना भय मुआ, कुशल कहाॅ ते होये।


अर्थ : हमेषा एक दूसरे से कुशल-कुशल पूछते हो। जब संसार में कोई नहीं रहा तो कैसा कुशल। बुढ़ापा नहीं मरा,न भय मरा तो कुशल कहाॅ से कैसे होगा।

कुशल जो पूछो असल की, आशा लागी होये
नाम बिहुना जग मुआ, कुशल कहाॅ ते होये।


अर्थ : यदि तुम वास्तव में कुशल पूछते हो तो जब तक संसार में आशक्ति है प्रभु के नाम सुमिरण और भक्ति के बिना कुशल कैसे संभव है।

कुटिल वचन नहि बोलिये, शीतल बैन ले चिन्हि
गंगा जल शीतल भया, पर्वत फोरा तिन्हि।


अर्थ : शत्रुता पूर्ण वचन कभी न बोले केेवल शीतल शुद्ध वचन समझ कर बोंले। गंगा जल शीतल एंव पवित्र है अतः पहाड़ फोड़ कर आता है। अच्छे वचन से सभी कठिन काम सिद्ध होते है।

कुटिल वचन सब ते बुरा, जारि करै सब छार
साधु वचन जल रुप है, बरसै अमृत धार।


अर्थ : दुष्टता पूर्ण वचनों से बुरा कुछ नहीं होता-यह सबों को जला कर राख कर देता है। किन्तु संतो के वचन जल के समान अमृत की धार वरसाते हैं।

क्या मुख ली बिनती करो , लाज आवत है मोहि |
तुम देखत ओगुन करो , कैसे भावो तोही ||


अर्थ : हे भगवान् ! तुझसे प्रार्थना करते हुए मुझे शर्म आती है। क्या तुम मेरी गलतियों और मेरे पापों के बावजूद मुझे अपना सकते हो?

लिखा लिखि की है नाहि, देखा देखी बात
दुलहा दुलहिन मिलि गये, फीकी परी बरात।


अर्थ : परमात्मा के अनुभव की बातें लिखने से नहीं चलेगा। यह देखने और अनुभव करने की बात है।
जब दुल्हा और दुल्हिन मिल गये तो बारात में कोई आकर्षण नहीं रह जाता है।

लूट सके तो लूट ले,राम नाम की लूट ।
पाछे फिर पछ्ताओगे,प्राण जाहि जब छूट ॥

अर्थ: कबीर दस जी कहते हैं कि अभी राम नाम की लूट मची है , अभी तुम भगवान् का जितना नाम लेना चाहो ले लो नहीं तो समय निकल जाने पर, अर्थात मर जाने के बाद पछताओगे कि मैंने तब राम भगवान् की पूजा क्यों नहीं की ।

माधव को भावै नहीं,सो हमसो जनि होये
सदगुरु लाजय आपना, साधु ना मानये कोये।


अर्थ : हे प्रभु मैं कोई ऐसा काम नहीं करुॅं जो आपको अच्छा नहीं लगता हो। इस से प्रभु मेरे कारण लज्जित होते है और मुझे भी कोई संत नहीं मान सकता है।

मान बड़ाई देखि कर, भक्ति करै संसार।
जब देखैं कछु हीनता, अवगुन धरै गंवार।।


अर्थ : दूसरों की देखादेखी कुछ लोग सम्मान पाने के लिये परमात्मा की भक्ति करने लगते हैं, पर जब वह नहीं मिलता तब वह मूर्खों की तरह इस संसार में ही दोष निकालने लगते हैं।

माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख ।
माँगन ते मारना भला, यह सतगुरु की सीख ॥

अर्थ: माँगना मरने के बराबर है ,इसलिए किसी से भीख मत मांगो . सतगुरु कहते हैं कि मांगने से मर जाना बेहतर है , अर्थात पुरुषार्थ से स्वयं चीजों को प्राप्त करो , उसे किसी से मांगो मत।

माला बनाये काठ की, बिच मे डारा सूत
माला बिचारी क्या करै, फेरनहार कपूत।


अर्थ : लकड़ी के माला के बीच में धागा डाला गया। परंतु वह माला बेचारा क्या करें। यदि माला फेरने वाला ही बुरे चरित्र का कपूत हो। प्रभु के स्मरण के लिये उत्तम चरित्र का पात्र आवस्यक है।

माला तो कर में फिरे, जीभ फिरे मुख माहि ।
मनुआ तो चहुं दिश फिरे, यह तो सुमिरन नाहि ॥


अर्थ : माला घुमाने से, या मंत्रो का उच्चारण करने से ध्यान नहीं होता। अर्थात ध्यान होता है मन को स्थिर करने से, क्रियाएं करने से नहीं।

माली आवत देखि के, कलियाॅं करे पुकार
फूले फूले चुनि लियो, कल्ह हमारी बार।

अर्थ : माली को आता देख कर फूल पूकारने लगी। सभी फूलों का तुम आज चुन लो-मेरी भी बारी कल्ह आऐगी। एक दिन सबकी एक ही दसा होगी।

माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय ॥


अर्थ: मिट्टी कुम्हार से कहती है कि आज तो तू मुझे पैरों के नीचे रोंद रहा है, लेकिन एक दिन ऐसा आएगा, कि तू मेरे तले होगा | अर्थात, जीवन में मनुष्य चाहे जितना भी शक्तिशाली हो, मृत्यु के बाद उसका शरीर मिट्टी हो जाता है |

माया चार प्रकार की, ऐक बिलसै एक खाये
एक मिलाबै राम को, ऐक नरक लै जाये।


अर्थ : माया चार किस्म की होती है। एक तातकालिक आनंद देती है। दूसरा खा कर घोंट जाती है। एक राम से संबंध बनाती है और एक सीधे नरक ले जाती है।

माया गया जीव सब,ठाऱी रहै कर जोरि
जिन सिरजय जल बूंद सो, तासो बैठा तोरि।


अर्थ : प्रतेक प्राणी माया के सम्मुख हाथ जोड़ कर खरे है पर सृजन हार परमात्मा जिस ने जल के एक बूंद से सबों की सृष्टि की है उस से हमने अपना सब संबंध तोड़ लिया है।

माया का सुख चार दिन, काहै तु गहे गमार
सपने पायो राज धन, जात ना लागे बार।


अर्थ : माया मोह का सुख चार दिनों का है। रे मूर्ख-तुम इस में तम पड़ो। जिस प्रकार स्वपन में प्राप्त राज्य धन को जाते दिन नहीं लगते है।

माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर
आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर


अर्थ: कबीर कहते हैं कि संसार में रहते हुए न माया मरती है न मन. शरीर न जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीर ऐसा कई बार कह चुके हैं.

मैं कलि का कोतवाल हूॅ, लेहू शब्द हमार
जो यह शब्दहि मानि है, सो उतरै भौपार।


अर्थ : मैं इस कलियुग का रक्षक पहरेदार हूॅं। हमारे शब्दों पर ध्यान दों जो मेरे उपदेश को मानेगें वे निश्चित ही इस भव रुपी संसार सागर के पार उतर जायेंगे।

मै तोहि सो कब कहयों, तु साकट के घर जाव
बहती नदिया डूब मरु, साकट संग ना खाव।


अर्थ : शाक्त मांसाहारी संप्रदाय के पुजारी होते है। कबीर कहते है की मैने तुम से शाक्त के घर के जाने के लिये कभी नहीं कहा। तुम बहती नदियाॅं में डूब कर मर जाओ पर शाक्त के साथ कभी मत खाओ।

मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई
पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई


अर्थ: मनुष्य मात्र को समझाते हुए कबीर कहते हैं कि मन की इच्छाएं छोड़ दो , उन्हें तुम अपने बूते पर पूर्ण नहीं कर सकते। यदि पानी से घी निकल आए, तो रूखी रोटी कोई न खाएगा.

मन उन्मना न तोलिये, शब्द के मोल न तोल ।
मुर्ख लोग न जान्सी, आपा खोया बोल ॥


अर्थ: अशांत या व्याकुल अवस्था में किसी के कही हुई बातों का अर्थ नहीं निकलना चाहिए। ऐसी हालत में व्यक्ति शब्दों का सही अर्थ समझने में असमर्थ होता है। मूर्ख लोग इस तथ्य को नहीं जानते, इसलिए किसी भी बात पर अपना संतुलन खो देते हैं ।

मन तो माया उपजय, माया तिरगुन रुप
पांच तत्व के मेल मे, बंधय सकल स्वरुप।


अर्थ : माया मन में उतपन्न होता है। इसके तीन रुप है-सतोगुण,रजोगुण,तमोगुण। यह पांच तत्वों इंद्रियों के मेल से संपूर्ण बिश्व को आसक्त कर लिया है।

मता हमारा मंत्र है, हम सा है सो लेह
शब्द हमारा कल्पतरु, जो चाहे सो देह।


अर्थ : मेरे विचार माॅं के समान लाभ दायी हैं। यदि तुम मेरे समान ही हित चाहते हो तो इसे वह प्राप्त करो। मेरे विचार कल्प वृक्ष के समान हैं। तुम जो भी इच्छा करोगे-तुम्हें इससे वह प्राप्त होगा।

मुख से नाम रटा करैं, निस दिन साधुन संग ।
कहु धौं कौन कुफेर तें, नाहीं लागत रंग ॥


अर्थ : रात दिन भगवान के नाम जपने, और रोज़ साधुओं के साथ संगत करने के बावजूद, कुछ लोगों पर भक्ति का रंग नहीं चढ़ता, क्योंकि वे अपने अंदर के विकारों से मुक्त नहीं हो पाते।

नागिन के तो दोये फन, नारी के फन बीस
जाका डसा ना फिर जीये, मरि है बिसबा बीस।


अर्थ : सांप के केवल दो फंन होते है पर स्त्री के बीस फंन होते है। स्त्री के डसने पर कोई जीवित नहीं बच सकता है। बीस लोगों को काटने पर बीसों मर जाते है।

नारी काली उजली, नेक बिमासी जोये
सभी डरे फंद मे, नीच लिये सब कोये।

अर्थ : स्त्री काली गोरी भली बुरी जो भी हो सब वासना के फंदे में फांसती है और तब भी एक नीच व्यक्ति हमेशा उसे अपने साथ कखता है।

नारी कहुॅ की नाहरी, नख सिख से येह खाये
जाल बुरा तो उबरै, भाग बुरा बहि जाये।


अर्थ : इन्हें नारी कहा जाय या शेरनी। यह सिर से पॅूछ तक खा जाती है। पानी में डूबने वाला बच सकता है पर बिषय भोग में डूबने वाला संसार सागर में बह जाता है।

नारी मदन तलाबरी, भव सागर की पाल
नर मच्छा के कारने, जीवत मनरी जाल।


अर्थ : नारी वासना का तालाव और इस भव सागर में डूबने से रक्षा हेतु पाल है। यह नर रुपी मछली को फंसाने का जाल डाला गया है।

नारी नरक ना जानिये, सब सौतन की खान
जामे हरिजन उपजै, सोयी रतन की खान।


अर्थ : नारी को नरक मत समझो। वह सभी संतों की खान है। उन्हीं के द्वारा भगवत पुरुषों कि उत्पत्ति होती है और वे ही रत्नों की खान है। प्रभु भक्तों को नारी ही जन्म देती है।

नारी निन्दा ना करो, नारी रतन की खान
नारी से नर होत है, ध्रुब प्रहलाद समान।


अर्थ : नारी की निन्दा मत करो। नारी अनेक रत्नों की खान है। नारी से ही पुरुष के उत्पत्ति होती है। घ्रुब और प्रहलाद भी किसी नारी की ही देन है।

नारी निरखि ना देखिये, निरखि ना कीजिये दौर
देखत ही ते बिस चढ़ै, मन आये कछु और।


अर्थ : नारी को कभी घूर कर मत देखो। देख कर भी उसके पीछे मत दौड़ो। उसे देखते ही बिष चढ़ने लगता है और मन में अनेक प्रकार के बिषय विकार गंदे विचार आने लगते है।

नारी पुरुष की स्त्री, पुरुष नारी का पूत
यहि ज्ञान विचारि के, छारि चला अवधूत।


अर्थ : एक नारी पुरुष की स्त्री होती है। एक पुरुष नारी का पुत्र होता है। इसी ज्ञान को विचार कर एक संत अवधूत कामिनी से विरक्त रहता है।

नारी पुरुष सबही सुनो, येह सतगुरु की साखी
बिस फल फले अनेक है, मति कोई देखो चाखी।


अर्थ : सतगुरु की शिक्षा को सभ्री स्त्री पुरुष सुनलो। बिषय वासना रुपी जहरीले फल को कभी नहीं चखना। ये बिषय वासाना रुपी जहरीले फल अनेका नेक है। इस से तुम बिरक्त रहो।

नारी सेती नेह, बुधि विवेक सभी हरै
बृथा गबावै देह, कारज कोई ना सरै।

अर्थ : स्त्री से वासना रुपी प्रेम करने में बुद्धि और विवके का हरण होता है। शरीर भी बृथा बेकार होता है और जीवन के भलाई का कोई भी कार्य सफल नहीं होता है।

न्हाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाय ।
मीन सदा जल में रहै, धोये बास न जाय ॥


अर्थ : बार बार नहाने से कुछ नहीं होता, अगर मन साफ़ न हो। अर्थात, बाहरी उपस्थिति से ज़यादा महत्वपूर्ण है मानव का चरित्र और उसका स्वभाव। उदाहरण के लिए, मछली सारी ज़िन्दगी पानी में रहती है, पर ‘धुल’ नहीं पाती – उसमे बदबू फिर भी आती है।

नर नारी के सूख को, खांसि नहि पहिचान
त्यों ज्ञानि के सूख को, अज्ञानी नहि जान।


अर्थ : स्त्री पुरुष के मिलन के सुख को नपुंसक नहीं समझ सकता है। इसी तरह ज्ञानी का सुख एक मूर्ख अज्ञानी नहीं जान सकता है।

नेह निबाहन कठिन है, सबसे निबहत नाहि
चढ़बो मोमे तुरंग पर, चलबो पाबक माहि।


अर्थ : प्रेम का निर्वाह अत्यंत कठिन है। सबों से इसको निभाना नहीं हो पाता है। जैसे मोम के घोंड़े पर चढ़कर आग के बीच चलना असंभव होता है।

निश्चल काल गरासही, बहुत कहा समुझाय
कहे कबीर मैं का कहुॅ, देखत ना पतियाय।

अर्थ : मृत्यु निश्चय ही सबको निगलेगा-कबीर ने इस तथ्य को बहुत समझाकर कहाॅ। वे कहते कहते है की मैं क्या करुॅ-लोग आख से देखने पर भी विश्वास नहीं करते है।

निगुरा ब्राहमन नहि भला, गुरुमुख भला चमार
देवतन से कुत्ता भला, नित उठि भूके द्वार।


अर्थ : एक मूर्ख ब्राहमन अच्छा नही है एक गुरु का शिष्य चर्मकार अच्छा है। देवताओं से कुत्ता अच्छा है जो नित्य उठकर दरवाजे पर भौंक कर चोरों से हमारी रक्षा करता है।

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।

निरजानी सो कहिये का, कहत कबीर लजाय
अंधे आगे नाचते, कला अकारथ जाये।

अर्थ : अज्ञानी नासमझ से क्या कहा जाये। कबीर को कहते लाज लग रही है। अंधे के सामने नाच दिखाने से उसकी कला भी व्यर्थ हो जाती है। अज्ञानी के समक्ष आत्मा परमात्मा की बात करना व्यर्थ है

पांच पहर धंधा किया , तीन पहर गया सोय |
एक पहर भी नाम बिन , मुक्ति कैसे होय ||

अर्थ: दिन के आठ पहर में, आप पाँच पहर काम करते हैं, और तीन पहर सोते हैं। अगर ईश्वर को याद करने के लिए आपके पास समय ही नहीं है, तो आपको मोक्ष कैसे मिल सकता है ?

पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात,
एक दिना छिप जाएगा,ज्यों तारा परभात
|

अर्थ: कबीर का कथन है कि जैसे पानी के बुलबुले, इसी प्रकार मनुष्य का शरीर क्षणभंगुर है।जैसे प्रभात होते ही तारे छिप जाते हैं, वैसे ही ये देह भी एक दिन नष्ट हो जाएगी |

पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजू पहाड़ ।
घर की चाकी कोई ना पूजे, जाको पीस खाए संसार ॥

अर्थ: कबीर कहते हैं कि अगर पत्थर की मूर्ती की पूजा करने से भगवान् मिल जाते तो वे पहाड़ कि पूजा कर लेते। लेकिन मूर्तियों से महत्वपूर्ण वो चक्की है, जिसमे पिसा हुआ अन्न लोगों का पेट भरता है। अर्थात परम्पराओं और प्रथाओं के साथ-साथ अपने काम का भी ध्यान रखना चाहिए।

पर नारी का राचना, ज्यूं लहसून की खान ।
कोने बैठे खाइये, परगट होय निदान ॥


अर्थ : पराई स्त्री के साथ प्रेम प्रसंग करना लहसून खाने के समान है। उसे चाहे कोने में बैठकर खाओ पर उसकी गंध दूर तक फैल जाती है। अर्थात, इसे छुपाना असंभव है।

पर नारी के राचनै, सीधा नरकै जाये
तिनको जम छारै नहि, कोटिन करै उपाये।


अर्थ : परायी स्त्री से कभी प्रेम मत करो। वह तुम्हे सीधा नरक ले जायेगी। उसे यम देवता भी नहीं छोड़ता है चाहे तुम करोड़ो उपाय करलो।

पर नारी पैनी छुरी, बिरला बंचै कोये
ना वह पेट संचारिये, जो सोना की होये।


अर्थ : दुसरो की नारी तेज धार वाली चाकू की तरह है। इस के वार से सायद ही कोई बच पाता है। उसे कभी अपने हृदय में स्थान मत दें-यदि वह सोने की तरह आकर्षक और सुन्दर ही क्यों न हो।

पर नारी पैनी छुरी, मति कौई करो प्रसंग
रावन के दश शीश गये, पर नारी के संग।


अर्थ : दुसरो की स्त्री तेज धार वाली चाकू की तरह है। उसके साथ किसी प्रकार का संबंध नहीं रखो। दुसरे के स्त्री के साथ के कारण ही रावण का दश सिर चला गया।

पढी गुनी पाठक भये, समुझाया संसार ।
आपन तो समुझै नहीं, वृथा गया अवतार ॥

अर्थ: कुछ लोग बहुत पढ़-लिखकर दूसरों को उपदेश देते हैं, लेकिन खुद अपनी सीख ग्रहण नहीं करते। ऐसे लोगों की पढ़ाई और ज्ञान व्यर्थ है।

फल कारन सेवा करे , करे ना मन से काम |
कहे कबीर सेवक नहीं , चाहे चौगुना दाम ||


अर्थ : कुछ लोग भगवान् का ध्यान फल और वरदान की आशा से करते हैं, भक्ति के लिए नहीं। ऐसे लोग भक्त नहीं, व्यापारी हैं, जो अपने निवेश का चैगुना दाम चाहते हैं।

पहिले यह मन काग था, करता जीवन घात ।
अब तो मन हंसा, मोती चुनि-चुनि खात ॥


अर्थ : कबीर कहते हैं कि मनुष्य का मन एक कौआ की तरह होता है, जो कुछ भी उठा लेता है। लेकिन एक ग्यानी का मन उस हंस के समान होता है जो केवल मोती खाता है।

पहले शब्द पहचानिये, पीछे कीजे मोल ।
पारखी परखे रतन को, शब्द का मोल ना तोल ॥


अर्थ : पहले शब्दों का अर्थ पूरी तरह से समझिये। उसके बाद ही उनके कारण या महत्व का विश्लेषण करिये। जौहरी भी केवल रत्नो को तोल सकता है, शब्दों को मापना बहुत कठिन है।

पसुवा सो पालोउ परयो, रहु हिया ना खीज
उसर बीज ना उगसी, बोबै दूना बीज।


अर्थ : पशु समान प्रवृति बाले लोगों से पाला पड़ने पर लगातार खीज होती रहती है। उसर परती जमीन पर दूगुना बीज डालने पर भी वह उगता नहीं है।

पीया चाहै प्रेम रस, राखा चाहै मान
दोय खड्ग ऐक म्यान मे, देखा सुना ना कान।


अर्थ : या तो आप प्रेम रस का पान करें या आंहकार को रखें। दोनों एक साथ संभव नहीं है एक म्यान में दो तलवार रखने की बात न देखी गई है ना सुनी गई है।

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

प्रेमभाव एक चाहिए , भेष अनेक बनाय |
चाहे घर में वास कर , चाहे बन को जाए ||


अर्थ : व्यक्ति हे हृदय में प्रेम होना चाहिए, उसका रूप या अवस्था चाहे जो भी हो – चाहे वो महल में रहे या जंगल में।

प्रीत पुरानी ना होत है, जो उत्तम से लाग
सौ बरसा जल मैं रहे, पात्थर ना छोरे आग।


अर्थ : प्रेम कभी भी पुरानी नहीं होती यदि अच्छी तरह प्रेम की गई हो जैसे सौ वर्षो तक भी वर्षा में रहने पर भी पथ्थर से आग अलग नहीं होता।

प्रीति बहुत संसार मे, नाना बिधि की सोय
उत्तम प्रीति सो जानिय, राम नाम से जो होय।


अर्थ : संसार में अपने प्रकार के प्रेम होते हैं। बहुत सारी चीजों से प्रेम किया जाता है। पर सर्वोत्तम प्रेम वह है जो राम के नाम से किया जाये।

प्रेम भक्ति मे रचि रहै, मोक्ष मुक्ति फल पाय
सब्द माहि जब मिली रहै, नहि आबै नहि जाय।


अर्थ : जो प्रेम और भक्ति में रच-वस गया है उसे मुक्ति और मोझ का फल प्राप्त होता है। जो सद्गुरु के शब्दों-उपदेशों से घुल मिल गया हो उसका पुनः जन्म या मरण नहीं होता है।

प्रेम बिना धीरज नहि, विरह बिना वैैराग
ज्ञान बिना जावै नहि, मन मनसा का दाग।


अर्थ : धीरज से प्रभु का प्रेम प्राप्त हो सकता है। प्रभु से विरह की अनुभुति हीं बैराग्य को जन्म देता है। प्रभु के ज्ञान बिना मन से इच्छाओं और मनोरथों को नहीं मिठाया जा सकता है।

प्रेम ना बारी उपजै प्रेम ना हाट बिकाय
राजा प्रजा जेहि रुचै,शीश देयी ले जाय।


अर्थ : प्रेम ना तो खेत में पैदा होता है और न हीं बाजार में विकता है। राजा या प्रजा जो भी प्रेम का इच्छुक हो वह अपने सिर का यानि सर्वस्व त्याग कर प्रेम प्राप्त कर सकता है। सिर का अर्थ गर्व या घमंड का त्याग प्रेम के लिये आवश्यक है|

प्रेम पंथ मे पग धरै, देत ना शीश डराय
सपने मोह ब्यापे नही, ताको जनम नसाय।


अर्थ : प्रेम के राह में पैर रखने वाले को अपने सिर काटने का डर नहीं होता। उसे स्वप्न में भी भ्रम नहीं होता और उसके पुनर्जन्म का अंत हो जाता है।

प्रेम प्रेम सब कोई कहै, प्रेम ना चिन्है कोई
जा मारग हरि जी मिलै, प्रेम कहाये सोई।


अर्थ : सभी लोग प्रेम-प्रेम बोलते-कहते हैं परंतु प्रेम को कोई नहीं जानता है। जिस मार्ग पर प्रभु का दर्शन हो जाये वही सच्चा प्रेम का मार्ग है।

प्रेम प्याला जो पिए , शीश दक्षिणा दे |
लोभी शीश न दे सके , नाम प्रेम का ले ||


अर्थ : प्रेम का प्याला केवल वही पी सकता है जो अपने सिर का वलिदान करने को तत्पर हो। एक लोभी-लालची अपने सिर का वलिदान कभी नहीं दे सकता भले वह कितना भी प्रेम-प्रेम चिल्लाता हो।

राजा की चोरी करै, रहै रंक की ओट
कहै कबीर क्यों उबरै, काल कठिन की चोट।


अर्थ : राजा के यहाॅं चोरी करके गरीब के घर शरण लेने पर कोई कैसे बच पायेगा। कबीर का कहना है की बिना गुरु के शरण में गये कल्पित देवताओं के द्वारा तुम मृत्यु के देवता काल के मार से कैसे बच पाओगे।

राम रसायन प्रेम रस, पीबत अधिक रसाल
कबीर पिबन दुरलभ है, मांगे शीश कलाल।

अर्थ : राम नाम की दवा प्रेम रस के साथ पीने में अत्यंत मधुर है। कबीर कहते हैं कि इसे पीना अत्यंत दुर्लभ है क्यों कि यह सिर रुपी अंहकार का त्याग मांगता है।

रात गवई सोय के दिवस गवाया खाय |
हीरा जन्म अनमोल था , कौड़ी बदले जाय ||


अर्थ : जो व्यक्ति इस संसार में बिना कोई कर्म किए पूरी रात को सोते हुए और सारे दिन को खाते हुए ही व्यतीत कर देता है वह अपने हीरे तुल्य अमूल्य जीवन को कौड़ियों के भाव व्यर्थ ही गवा देता है ।

रैन तिमिर नासत भयो, जब ही भानु उगये
सार शब्द के जानते, करम भरम मिटि जाये।


अर्थ : सूर्य के उदय के कारण दिन का अंधकार अंत हो जाता है। इसी प्रकार मेरे शब्दों-उपदेशों का मूल तत्व जान लेने पर सभी सांसारिक कर्मों का भ्रम समाप्त हो जाता है।

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।

साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाही ।
धन का भूखा जो फिरे, सो तो साधू नाही ॥


अर्थ : संत केवल भाव व ज्ञान की इच्छा रखते हैं। उन्हें धन का कोई लोभ नहीं होता। जो व्यक्ति साधू बनकर भी धन-संपत्ति के पीछे भागता है, वह संत नहीं हो सकता।

साधु सब ही सूरमा, अपनी अपनी ठौर
जिन ये पांचो चुरीया, सो माथे का मौर।


अर्थ : सभी संत वीर हैं-अपनी-अपनी जगह में वे श्रेष्ठ हैं। जिन्होंने काम, क्रोध, लोभ, मोह एंव भय को जीत लिया है वे संतों में सचमुच महान हैं।

साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥


अर्थ: कबीर दस जी कहते हैं कि परमात्मा तुम मुझे इतना दो कि जिसमे बस मेरा गुजरा चल जाये , मैं खुद भी अपना पेट पाल सकूँ और आने वाले मेहमानो को भी भोजन करा सकूँ।

साहिब के दरबार मे, कामी की नाहि
बंदा मौज ना पावही, चूक चाकरी माहि।


अर्थ : ईश्वर के दरवार में किसी चीज की कोई कमी नहीं है। यदि मुझे उनकी कृपा नहीं प्राप्त हो रही है तो मेरी सेवा में कोई कमी या खोट है।

साजन सनेही बहुत हैं, सुख मे मिलै अनेक
बिपति परै दुख बाटिये, सो लाखन मे ऐक।


अर्थ : सुख मे अनेक सज्जन एंव स्नेही बहुतायत से मिलते हैं पर विपत्ति में दुख वाटने वाला लाखों मे एक ही मिलते हैं।

सब धरती कागज करुॅं, लेखन सब बनराय
साात समुंद्र की मसि करुॅं, गुरु गुन लिखा ना जाये।


अर्थ : संपूर्ण धरती को कागज, सारी दूनियाॅ के जंगलों को कलम और सातों समुद्र का जल यदि स्याही हो जाये तब भी गुरु के गुणों का बर्णन नहीं किया जा सकता है।

सब कुछ हरि के पास है, पाइये आपने भाग
सेवक मन सौंपै रहै, रहे चरन मे लाग।


अर्थ : भ्गवान के पास सब कुछ है। हम उनसे अपने हिस्से का पा सकते है। भक्त सेवक अपना मन पुर्णरुपेन समर्पित कर उनके चरणों में आसक्ति रखें।

सब पापन का मूल है, ऐक रुपैया रोके
साधुजन संग्रह करै, हरै हरि सा ठोके।


अर्थ : विलासिता हेतु एक रुपये का संचय भी पाप का मूल कारण है। परमेश्वर अपने सम्पुर्ण कोष संतो ंके संग्रह हेतू सब कुछ समर्पित कर देते है।

सबै रसायन हम किया, प्रेम समान ना कोये
रंचक तन मे संचरै, सब तन कंचन होये।


अर्थ : समस्त दवाओं -साधनों का कबीर ने उपयोग किया परंतु प्रेम रुपी दवा के बराबर कुछ भी नहीं है। प्रेम रुपी साधन का अल्प उपयोग भी हृदय में जिस रस का संचार करता है उससे सम्पूर्ण शरीर स्र्वण समान उपयोगी हो जाता है।

संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत
चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत।


अर्थ: सज्जन को चाहे करोड़ों दुष्ट पुरुष मिलें फिर भी वह अपने भले स्वभाव को नहीं छोड़ता. चन्दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते हैं, पर वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता |

संतो खायी रहत है, चोरा लिनहि जाये
कहै कबीर विचारी के, दरगाह मिलि है आये।


अर्थ : संतो पर किया गया धन का खर्च बचा रहता है। शेष धन चोर ले जाता है। कबीर का सुविचारित मत है की धर्म सतकर्म पर खर्च किया गया धन प्रभु के दरवार में वापस मिल जाता है।

सतगुरु की महिमा अनँत, अनँत किया उपगार ।
लोचन अनँत उघारिया, अनँत दिखावनहार ।।


अर्थ : सद्गुरु की महिमा अनन्त है और उनके उपकार भी अनन्त हैं। उन्होंने मेरी अनन्त दृष्टि खोल दी जिससे मुझे उस अनन्त प्रभु का दर्शन प्राप्त हो गए।

सतगुरु मिला तो सब मिले, ना तो मिला न कोय ।
मात पिता सूत बान्धवा, यह तो घर घर होय ॥


अर्थ : जिसने एक सच्चा गुरु पा लिया, उसने मानो सारा संसार पा लिया। माता, पिता, बच्चे और दोस्त तो सभी के होते हैं, लेकिन गुरु का भाग्य सबको नहीं मिलता।

सतगुरु शब्द उलंघि कर, जो सेवक कहु जाये
जहाॅ जाये तहाॅं काल है, कहै कबीर समुझाये।

अर्थ : प्रभु के वचतन को अनसुना कर यदि कोई भक्त सेवक कहीं अन्यत्र जाता है तो वह जहाॅ जायेगा-मृत्यु उसका पीछा करेगा। कबीर इस तथ्य को समझा कर कहते है।

सतयुग त्रेता द्वापरा, येह कलियुग अनुमान
सार शब्द ऐक सच है, और झूठ सब ज्ञान।


अर्थ : सतयुग,त्रेता द्वापर और इस कलियुग का एकमात्र अनुमान है कि प्रभु का ज्ञान ही एकमात्र सत्य है।अन्य सभी ज्ञान झूठ हैं।

सौ जोजन साजन बसै, मानो हृदय मजहार
कपट सनेही आंगनै, जानो समुन्दर पार।


अर्थ : वह हृदय के पास हीं बैठा है। किंतु एक झूठा-कपटी प्रेमी अगर आंगन में भी बसा है तो मानो वह समुद्र के उसपार बसा है।

सेवक के बल बहुत है, सबको करत अधीन
देव दनुज नर नाग सब, जेते जगत प्रवीन।


अर्थ : प्रभु का सेवक बहुत शक्ति शाली होता है। वह सबको अपने अधीन कर लेता है। देवता, आदमी, राक्षस,सांप इस विश्व के समस्त प्राणी उसके नियंत्रन मे हो जाते है।

सेवक फल मांगे नहीं, सेब करे दिन रात
कहै कबीर ता दास पर, काल करै नहि घात।


अर्थ : प्रभु का सेवक कुछ भी फल नहीं मांगता है। वह केवल दिन रात सेवा करता है। कबीर का कहना है की उस दास पर मृत्यु या काल भी चोट या नुक्सान नहीं कर सकता है।

सेवक स्वामी ऐक मत, मत मे मत मिलि जाये
चतुरायी रीझै नहीं, रीझै मन के भाये।

अर्थ : जब तक स्वामी और सेवक का विचार मिलकर एक नहीं हो जाता है तब तक प्रभु किसी प्रकार की बुद्धिमानी, चतुराई से प्रशन्न नहीं हाते है। वे तो केवल मन के समर्पण भाव से खुस होते है।

सेवक सेवा मे रहै, सेवक कहिये सोय
कहै कबीर सेवा बिना, सेवक कभी ना होय।


अर्थ : सेवक को सदा सेवा में रत रहना चाहिये। उसे ही सच्चा सेवक कहेंगे। कबीर कहते है की सेवा किये बिना कोई सच्चा सेवक नहीं हो सकता है।

शंकर हु ते सबल है, माया येह संसार
अपने बल छुटै नहि, छुटबै सिरजनहार।


अर्थ : यह संसार एक माया है जो शंकर भगवान से भी अधिक बलवान है। यह स्वंय आप के प्रयास से कभी नहीं छुट सकता है। केवल प्रभु ही इससे आपको उवार सकते है।

श्रम से ही सब कुछ होत है, बिन श्रम मिले कुछ नाही ।
सीधे ऊँगली घी जमो, कबसू निकसे नाही ॥


अर्थ : जिस तरह जमे हुए घी को सीधी ऊँगली से निकलना असम्भव है, उसी तरह बिना मेहनत के लक्ष्य को प्राप्त करना सम्भव नहीं है ।

सिर राखे सिर जात है, सिर कटाये सिर होये
जैसे बाती दीप की कटि उजियारा होये।


अर्थ : सिर अंहकार का प्रतीक है। सिर बचाने से सिर चला जाता है-परमात्मा दूर हो जाता हैं। सिर कटाने से सिर हो जाता है। प्रभु मिल जाते हैं जैसे दीपक की बत्ती का सिर काटने से प्रकाश बढ़ जाता है।

सोना सज्जन साधू जन , टूट जुड़े सौ बार |
दुर्जन कुम्भ कुम्हार के , एइके ढाका दरार ||


अर्थ : सोने को अगर सौ बार भी तोड़ा जाए, तो भी उसे फिर जोड़ा जा सकता है। इसी तरह भले मनुष्य हर अवस्था में भले ही रहते हैं। इसके विपरीत बुरे या दुष्ट लोग कुम्हार के घड़े की तरह होते हैं जो एक बार टूटने पर दुबारा कभी नहीं जुड़ता।

सूरा के मैदान मे, कायर का क्या काम
सूरा सो सूरा मिलै तब पूरा संग्राम।


अर्थ : वीरों के युद्ध क्षेत्र में कायरों का क्या काम। जब वीर का मिलन होता है तो संग्राम पूरा होता है। जब एक साधक को ज्ञानी गुरु मिलते हैं तभी पूर्ण विजय मिलती है।

सूरा के मैदान मे, कायर फंदा आये
ना भागे ना लड़ि सकै, मन ही मन पछिताये।


अर्थ : वीरों के मैदान में एक कायर फॅंस जाता है। उसे न तो भागते बनता है और न ही लड़ते बनता है। वह केवल मन ही मन पछताता रहता है।

सूरा सोई जानिये, लड़ा पांच के संग
राम नाम राता रहै, चढ़ै सबाया रंग।


अर्थ : सूरवीर उसे जानो जो पाॅंच बिषय-विकारों के साथ लड़ता है। वह सर्वदा राम के नाम में निमग्न रहता है और प्रभु की भक्ति में पूरी तरह रंग गया है।

सूरा सोई सराहिये, लड़ै धनी के हेत
पुरजा पुरजा है परै, तौउ ना छारै खेत।


अर्थ : उस वीर की सराहना करें जो महान प्रभु के हेतु निरंतर संघर्ष-साधना करता है। वह युद्ध के मैदान-साधन के पथ को कभी नहीं छोड़ता है भले ही उसके टुकड़े टुकड़े हो जायें।
वह सर्वस्व त्याग के बाबजूद साधना पथ पर अडिग रहता है।

सुख मे सुमिरन ना किया, दु:ख में करते याद ।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥


अर्थ : अच्छे समय में भगवान् को भूल गए, और संकट के समय ही भगवान् को याद किया। ऐसे भक्त कि प्रार्थना कौन सुनेगा ?

सुरति करौ मेरे साइयां, हम हैं भौजल माहिं ।
आपे ही बहि जाहिंगे, जौ नहिं पकरौ बाहिं ॥


अर्थ : हे भगवान् ! मुझे याद रखना। मैं इस सागर-रुपी जीवन में बह रहा हूँ, और अगर आपका सहारा न मिला, तो मैं अवश्य ही डूब जाऊंगा।

ताको लक्षण को कहै, जाको अनुभव ज्ञान
साध असाध ना देखिये, क्यों करि करुन बखान।

अर्थ : जिसे अनुभव का ज्ञान है उसके लक्षणों के बारे में क्या कहा जाय। वह साधु असाधु में भेद नहीं देखता है।
वह समदर्शी होता है। अतः उसका वर्णन क्या किया जाय।

तन की जाने मन की जाने, जाने चित्त की चोरी ।
वह साहब से क्या छिपावे, जिनके हाथ में डोरी ॥


अर्थ : भगवान तो सर्व व्यापी एवं सर्वज्ञ है। वह तुम्हारे मन में छुपी भावनायों को भी जानते हैं। जो ईश्वर सारे संसार को चलाता है, उससे कभी कुछ छिपा नहीं रहता।

तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई,
सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ

अर्थ: शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना सरल है, पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं.

तन को जोगी सब करै, मन को करै ना कोये
सहजये सब सिधि पाइये, जो मन जोगी होये।


अर्थ : शरीर के लिये योगासन सभी करते है पर मन के लिये कोई नहीं करता। यदि कोई मन का योगी हो जाये तो उसे समस्त सिद्धियाॅं उसे प्राप्त हो सकती है।

तरुवर पात सों यों कहै, सुनो पात एक बात
या घर याही रीति है, एक आवत एक जात।


अर्थ :बृक्ष पत्तों से कहता है की ऐ पत्तों मेरी एक बात सुनों। इस धर का यही तरीका है की एक आता है और एक जाता है।

टेक करै सो बाबरा, टेकै होबै हानि
जो टेकै साहिब मिलै, सोई टेक परमानि।


अर्थ : जिद करना मूर्खता है। जिद करने से नुकसान होता है। जिस जिद से परमात्मा की प्राप्ति हो वही जिद उत्तम है।

टेक ना किजीय बाबरे, टेक माहि है हानि
टेक छारि मानिक मिले, सतगुरु वचन प्रमानि।


अर्थ : मुर्खों कभी हठ मत करो। हठ से बहुत हानि होती है। हठ छोड़ने पर माणिक्य रत्न की प्राप्ति होती है। यह सदगुरु के उपदेशों से प्रमाणित हो चुका है। जिद छोड़कर गुरु के उपदेशों को मानने पर ईश्वर रुपी रत्न की प्राप्ति होती है।

तिमिर गया रबि देखत, कुमति गयी गुरु ज्ञान
सुमति गयी अति लोभ से, भक्ति गयी अभिमान ।


अर्थ : अंधकार सूर्य को देखते ही भाग जाता है। गुरु के ज्ञान से मूर्खता का नाश हो जाता है। अत्यधिक लालच से सुबुद्धि नष्ट हो जाता है और अंहकार से भक्ति का अंत हो जाता है।

तु तु करु तो निकट हैं, दुर दुर करु तो जाये
ज्यों हरि राखै त्यों रहे, जो देबै सो खाये।

अर्थ : यदि प्रभु बुलाते है तो मैं निकट आ जाता हूॅ। वे यदि दूर कहते है तो मैं बहुत दूर चला जाता हूॅं। प्रभु को जिस प्रकार रखना होता है मैं वैसे ही रहता हूॅं। वे जो भी खाने को देते है मैं वही खा कर रहता हूॅं। मैं प्रभु पर पूरी तरह निर्भर हूॅं।

उजल देखि ना धिजिये, बग ज्यों मंदै ध्यान
डारै बैठै चापते सी,यों लै बूरै ज्ञान।


अर्थ : उज्जवल वेश देखकर विश्वास मत करो। बगुला नदी की धार के किनारे बैठ कर ध्यान लगाये रहता है और मछली पकड़ कर खा जाता है। उसी तरह वह धोखे बाज भी साधु के वेश में तुम्हारे विवके का हरण कर सकता है।

उजल पहिने कापड़ा, पान सुपारी खाये
कबीर हरि की भक्ति बिन, बंघा जम पुर जाये।


अर्थ : उजला कपड़ा पहन कर मुॅंह में पान सुपारी खा कर लोग अपने घमंड में रहते हैं। कबीर कहते हैं कि प्रभु की भक्ति के बिना एक दिन मृत्यु के देवता हमें बाॅंधकर ले जायंेगे।

उजर घर मे बैठि के, कैसा लिजय नाम
सकुट के संग बैठि के, किउ कर पाबेराम।

अर्थ : सुनसान उजार घर में बैठकर किसका नाम पुकारेंगे। इसी तरह मुर्ख-अज्ञानी के साथ बैठकर ईश्वर को कैसे प्राप्त कर सकंेगे।

उलटे सुलटे बचन के, सीस ना मानै दुख
कहै कबीर संसार मे, सो कहिये गुरु मुख।

अर्थ : गुरु के सही गलत कथन से शिष्य कभी दुखी नहीं होता है। कबीर कहते है की वही शिष्य सच्चा गुरु मुख कहलाता है।

उॅचा मंदिर मेरिया, चूना कलि घुलाय
ऐकहि हरि के नाम बिन, जादि तादि पर लै जाय।


अर्थ : उॅंचा मंदिर बनाया गया उसे चूना और रंग से पोत कर सुन्दर बना दिया गया। परंतु प्रभु की पूजा और भजन-कीत्र्तन के बिना एक दिन वह स्वतः नष्ट हो जायेगा।

उॅंचा तरुवर गगन फल, पंछी मुआ झूर
बहुत सयाने पचि गये, फल निरमल पैय दूर।


अर्थ : वृक्ष बहुत उॅंचा है और फल आसमान में लगा है-पक्षी बिना खाये मर गई। अनेक समझदार और चतुर व्यक्ति भी उस निर्मल पवित्र फल को खाये बिना मर गये। प्रभु की भक्ति कठिन साधना के बिना संभव नहीं है।

उॅचै कुल के कारने, बंस बांध्यो हंकार
राम भजन हृदय नाहि, जायों सब परिवार।

अर्थ : उच्च कुल-वंश के कारण बाॅंस घमंड से बंधा हुआ अकड़ में रहते है। जिसके ह्रदय में राम की भक्ति नहीं है उसका संपूर्ण परिवार नष्ट हो जाता है। बाॅंस के रगड़ से आग पैदा होने के कारण सारे बाॅंस जल जाते है |

ऊँचे पानी ना टिके, नीचे ही ठहराय |
नीचा हो सो भारी पी, ऊँचा प्यासा जाय ||

वचन वेद अनुभव युगति आनन्द की परछाहि
बोध रुप पुरुष अखंडित, कहबै मैं कुछ नाहि।


अर्थ : वेदों के वचन,अनुभव,युक्तियाॅं आदि परमात्मा के प्राप्ति के आनंद की परछाई मात्र है। ज्ञाप स्वरुप एकात्म आदि पुरुष परमात्मा के बारे में मैं कुछ भी नहीं बताने के लायक हूॅं।

बैद मुआ रोगी मुआ , मुआ सकल संसार |
एक कबीरा ना मुआ , जेहि के राम आधार ||

अर्थ : बीमार हो या चिकित्सक, दोनों की मौत निश्चित है। इस संसार में हर व्यक्ति का का मरना निश्चित है, लेकिन जिसने राम का सहारा ले लिया हो, वो अमर हो जाता है।

यह तट वह तट ऐक है, ऐक प्रान दुइ गात
अपने जीये से जानिये, मेरे जीये की बात।


अर्थ :प्रेम की धनिष्टता होने पर प्रेमी और प्रिय दोनों एक हो जाते हैं। वस्तुतः वे एक प्राण और दो शरीर हो जाते हैं। अपने हृदय की अवस्था जानकर अपने प्रेमी के हृदय की स्थिति जान जाते हैं।

यह तो घर है प्रेम का, उंचा अधिक ऐकांत
सीस काटि पग तर धरै, तब पैठे कोई संत।


अर्थ : यह घर प्रेम का है। बहुत उॅंचा और एकांत है। जो अपना शीश काट कर पैरों के नीचे रखने को तैयार हो तभी कोई संत इस घर में प्रवेश कर सकता है। प्रेम के लिये सर्वाधिक त्याग की आवश्यकता है।

येह मन ताको दिजिये, सांचा सेवक होये
सिर उपर आरा सहै, तौ ना दूजा होये।


अर्थ : यह मन उन्हें अर्पित करों जो प्रभु का सच्चा सेवक हो। अगर उसके सिर पर आरा भी चले तब भी वह तुम्हें छोड़कर किसी अन्य की शरण में नहीं जाये।

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