Rahat Indori – Bulati Hai Magar Jane Ka Nai | राहत इन्दौरी – बुलाती है मगर जाने का नईं | Ghazal

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Hindi Kala presents bulati hai magar jaane ka nai Ghazal by Rahat Indori.

राहत इन्दौरी की यह ग़ज़ल मुझे बेहद पसंद है, इसमें सो ‘नई’ शब्द का प्रयोग हुआ है उसका मतलब ‘नया’ नहीं, उसका मतलब ‘नहीं’ है क्योंकि कुछ सालो पहले ग़ज़ल में ‘नहीं’ का उच्चारण ‘नई’ होता था।  राहत साब ने इस ग़ज़ल में उसी उच्चारण का प्रयोग किया है, इसलिए आपसे आग्रह है इसको पढ़ते समय इसे ‘नाई’ करके पढे। 

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राहत इन्दौरी ग़ज़ल की ‘बुलाती है मगर जाने का नईं’ हिंदी लिपि में 

बुलाती है मगर जाने का नईं 
ये दुनिया है इधर जाने का नईं 
 
मेरे बेटे किसी से इश्क़ कर
मगर हद से गुजर जाने का नईं 
 
सितारें नोच कर ले जाऊँगा
मैं खाली हाथ घर जाने का नईं 
 
वबा फैली हुई है हर तरफ
अभी माहौल मर जाने का नईं 
 
वो गर्दन नापता है नाप ले
मगर जालिम से डर जाने का नईं
 
– राहत इन्दौरी


Bulati Hai Magar Jaane Ka Nai Ghazal in Roman Transcript

Bulati Hai Magar Jaane Ka Naai
Yeh Duniya Hai Idhar Jaane Ka Naai
 
Mere Bete Kisi Se Ishq Kar
Magar Hadd Se Gujar Jaane Ka Naai
 
Sitare Noch Kar Le Jaunga
Mai Khaali Haath Ghar Jaane Ka Naai
 
Bawa Faili Huyi Hai Har Taraf
Abhi Mahaul Mar Jaane Ka Naai
 
Woh Gardan Naapta Hai Naap Le
Magar Zaalim Se Darr Jane Ka Naai
 
– Rahat Indori

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